Success Evryone, The Deep Secret !

असफलता सफलता की पहली सीढ़ी है! किसी भी कार्य के प्रथम चरण मेँ असफल होना एक प्राकृतिक नियम की तरह है! लगातार असफल होना आपकी गलती है, सफलता व्यक्ति की अपनी मानसिक शक्ति पर निर्भर करता है!मानसिक शक्ति का अर्थ है अपने कार्य पर विस्वाश रखना सकारात्मक रहना और अपने क्रोध की भावना पर नियंत्रण रखना
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जब कोई फूल खिलता है तो वह पूरी तरह से खिलता है एक घास का तिनका भी उतना ज्यादा उगता है जितना वो उग सकता है, अर्थ यह है वो अपना पूरा प्रयास करता है और स्वयं को जितना भव्य और उच्च बना सकता है वह स्वयं को बनाता है यही सफलता का सार है

प्रकृति से सफलता के नियम सीखे,प्रकृति में कही भी आलस्य नहीं है वो अपने सभी कार्य अपने तय समय पर
ही करती रहती है!प्रकृति एक अभौतिक अवचेतन मन है प्रकृति में जितने भी मौसम और क्रियाएं घटित होते है उसकी प्रोग्रामिंग उसने स्वयं की है प्रकृति की प्रत्येक योजना को देखिये कितनी खूबसूरत प्लानिंग है सृस्टि में बौद्धिक छमता कितनी अधिक है इसे समझ पाना किसी भी साधारण व्यक्ति के लिए असंभव है
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जैसे मनुष्य स्वयं को महसूस करता है ठीक उसी तरह प्रकृति अपने सभी जीवो को महसूस करती है क्योकि प्रत्येक जीव के भीतर सृष्टि स्वयं बिद्यमान है मनुष्य मन और सृष्टि का मन दोनों एक दूसरे से लयबद्ध है दोनों एक है इस लिए जब मनुष्य किसी चीज पर विश्वास की गहरी भावना रखता है तो वह सच हो जाता है विस्वाश का सीधा अर्थ वर्तमान है और वर्तमान का अर्थ उसका कही ना कही मौजूद होना है चाहे उसका स्वरुप भौतिक हो या अभौतिक!

मनुष्य स्वयं सृस्टि कर्ता के समान है वह संतान उत्पन्न करके परिवार बढ़ाता है वह एक शरीर और एक मन को जन्म देता है फिर वही मनुष्य अन्य सांसारिक सफलता को क्यों नहीं प्राप्त कर पाता!कारण मन का विस्वाश होता है वह संतान उत्पन्न कर लेगा उसे यह नैसर्गिक विस्वाश होता है किन्तु अन्य सफलताओ के प्रति वह नकारात्मक होता है क्योकि अन्य दूसरे कर्मो में उसे नैसर्गिक विस्वाश नहीं होता लेकिन यहाँ उसे विश्वाश उत्पन्न करना पड़ता है यहाँ हर्ष नहीं संघर्ष होता है अनेक कठिनाइयाँ होती है
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जब मनुष्य सफलता का कोई विचार लेकर उसे पाने का प्रयास करता है तो प्रकृति उस विचार को नीचे की ओर दबाती है जैसे कोई बीज मिटटी के निचे गहन अंधकार में जाकर सड़ता है दबता है तभी वह विशाल पेड़ के रूप में उत्पन्न हो पाता है मनुष्य की असफलता प्रकृति वह नियम है जो मनुष्य को सफलता के अनेक आयाम के उच्च शिखर तक लेकर जाता है असफलता ही सफलता का स्वर्णिम सोपान होता है

एक विशालकाय पेड़ सर्वप्रथम एक हीन बीज होता है मनुष्य का विचार भी पहले छोटा सा ही विचार होता है कालांतर में वह विशालकाय रूप धारण कर सजीव रूप को साकार कर उत्पन हो जाता है ये अनंत ब्रम्हांड भी किसी वक़्त एक नन्हा सा केंद्र बिंदु था और आज यह अनत विशाल रूप में चारो तरफ फ़ैल चूका है
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असफलता यानि छुद्रता से आगे की जाने वाली लगातार क्रिया ही सफलता का विशालतम रूप है!असफलता के बिंदु पर ठहर जाना ही असफलता है! यानि आगे की क्रिया का ना होना
समस्त सृस्टि कर्मशील और गतिशील रहती है सृस्टि तो स्वयं आराम भी नहीं करती, किन्तु जीवो को सुख और आराम का समय अवश्य देती है

सृस्टि तब तक आपके कर्मो में हस्तछेप नहीं करती जब तक आपके सभी कर्म शुभ और अन्य जीवो के लिए कल्याणकारी होते है किन्तु जब कोई मनुष्य अशुभ कर्मो में लिप्त होता है तो प्रकृति उसे किसी ना प्रकार का दंड भी देती है और सभी कर्म तथा सभी कर्मफल मनुष्य स्वयं करता और भोगता है
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मनुष्य के भीतर वो शक्ति बिद्यमान है जिसने इस समस्त सृस्टि को उत्पन्न किया है, किन्तु मनुष्य अपने भीतर सृस्टि की उच्च शक्तियो से अनजान होने के कारण असफलता के आगे की क्रिया को अनवरत नहीं कर पाता और वह निराश होकर रुक जाता है यही उसकी सबसे बड़ी गलती है जो उस असफल बनाये रखती है

किसी मनचाही चीज को प्राप्त का लेना ही सफलता है सच में सफलता जैसी कोई चीज नहीं होती , ये तो असफलता से आगे की जाने वाली मात्र एक लगातार क्रिया है!बहुत से मनुष्य किसी ना प्रकार की चिंता में डूबे रहते है और इससे उन्हें कुछ प्राप्त भी नहीं होता उन्हें चिंतित होने की आदत लग जाती है ! जब कि उन्हें अपनी समस्या के आगे भी अति क्रियशील होना चाहिए निश्चित ही समस्या का समाधान हो जाता है यहाँ तक की चिंतित व्यक्ति आत्म ह्त्या तक कर लेता है
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किसी भी प्रकार की चिंता का अर्थ मानसिक दुर्बलता से है और मानसिक दुर्बलता के पीछे नकारात्मक विचारो का हाथ होता है इसलिए मनुष्य को प्रकृति की तरह सकारात्मक और लगातार कर्मशील रहना चाहिए सफलता कोई कठिन बस्तु नहीं होती, कर्म हीन होना ही असफलता है यही मनुष्य की अपनी वो सबसे बड़ी गलती होती है! जिसे वह शीघ्र समझ ही नहीं पाता तथा इसके लिए वह समाज परिवार और ईश्वर को भी दोष देता रहता है !
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किसी अन्य को दोष देना छोड़कर अनेक असफलताओ के बाद भी सफलता के लिए लगातार क्रिया में रहे! जिससे आपकी प्रत्येक असफलता आपके लिए एक बड़ी सफलता में परिवर्तित हो सके! क्योकि असफलता से आगे मात्र और मात्र सफलता की ही मंजिल होती है

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