अपने भीतर की आत्म ज्योति को प्रज्वलित करो – भाग ६ (Self Inner Lite The Baurn)

प्रेतआत्मा की बात सुनकर वह धार्मिक व्यक्ति बोला जिन कामो को अभी तुमने पूरा किया है उसे फिर से करो प्रेतात्मा ने कहा की वो उस काम को आज ही फिर से नहीं कर सकता उसे नया दूसरा काम चाहिए …यह जानकर उस व्यक्ति ने कहा की ठीक है जाओ तुम इस पृथ्वी के सौ चक्कर लगा कर आओ
प्रेतात्मा ने कहा की वो सभी ग्रहो के हजार चक्कर लगा सकता है लेकिन वरदान के कारण वो उस व्यक्ति से ज्यादा दूर नहीं जा सकता कोई नया काम अतिशीघ्र बताया जाये

अब वह धार्मिक व्यक्ति बोला घर के आँगन में एक नीम का पेड़ है जब तक मैं कोई दूसरा काम ना बताऊ तब तक तुम उस नीम के पेड़ पर बार बार दौड़ो और नीचे उतरो! अभी तुम्हे यही करना है प्रेतात्मा ने ठीक वैसा ही किया उस धार्मिक व्यक्ति ने उसे नया काम दूसरे दिन बताया तब तक वह प्रेतात्मा उस नीम के पेड़ पर ही ऊपर नीचे दौड़ता रहा दूसरे दिन फिर उस धार्मिक व्यक्ति ने उसे एक दूसरे पेड़ पर दौड़ने के लिए कहा प्रेतात्मा ने ठीक वैसा ही किया

अब उस धार्मिक व्यक्ति की चिंता दूर हो चुकी थी उसने अपने इष्ट देव को धन्यवाद कहा !
इस कहानी से हमें कई सीख मिलती है मनुष्य का चेतन मन उस प्रेतात्मा की तरह है जो खाली बैठ नहीं सकता वो हमेशा कुछ ना कुछ गुणा भाग करता ही रहता है मैं व्यक्तिगत अपनी बात करू तो मैं दुनिया के सभी धर्मो का आदर सम्मान करता हूँ क्योकि सभी धर्म आध्यात्मिक राह की ही बात करते है सुख शांति की बात करते है

एक साधारण व्यक्ति अपने पुरे जीवन काल में अपनी मस्तिष्क शक्ति का मात्र 2.50/3.50 प्रतिशत ही उपयोग करता है एक विद्वान या कोई महान वैज्ञानिक भी अपने ब्रेन शक्तिः का 6.30/8.70 प्रतिशत ही उपयोग अपने जीवन काल में कर पाता है बाक़ी 97/91% मस्तिष्कीय शक्ति ऐसे ही वापस चली जाती है

बात करे किसी दिव्यदर्शी या किसी महान योगी की तो वह भी अपने मस्तिस्क का सिर्फ 40/60% शक्ति को ही अपने जीवन काल में जागृत कर पाता है मन बहुत रहस्य्मयी शक्तिः है साधारण अवस्था में इसे समझ पाना असंभव है जब किसी योगी की सभी कुण्डलनी जागृत होकर चेतना एक बिंदु पर ठहर जाये या आज्ञाचक्र में आकर रुक जाये तो भी वह अपने मस्तिष्क का 100% जागृत नहीं कर पाता अपने मन की शक्ति को 100% जाग्रत करने का सीधा अर्थ है मनुष्य शरीर से परे हो जाना सांसारिक जीवन से परे हो जाना और उस परम अवस्था में आ जाना जिसे मनुष्य God ईश्वर परमात्मा के नाम से जानता है जिसे सबकॉन्सियस माइंड या अवचेतन मन कहा जाता है

यह अवस्था एक विराट रूप है एक अनंत शून्य अवस्था है इस अवस्था में कोई रूप रंग नहीं होता सिर्फ मस्तिष्क होता है एक ऐसा शक्तिसाली मन जो दिखाई नहीं देता किन्तु वो हमेशा वर्तमान जीवन की तरह उपलब्ध होता है वो सभी रचनाओं का रचनाकार है वो एक भव्य सुन्दर रौशनी है वो असीम अनंत बुद्धि वाला है वो ही संगीत है वो ही अनंत विचारो और भावनाओ का जनक है इस अवस्था में वो जीवन मृत्यु से पूर्णतया मुक्त है

जब किसी व्यक्ति के पास खाली वक़्त हो तो वह अपने मन को हमेसा एक काम में लगा दिया करे वह अपने मन में ये शब्द बार बार दोहराता रहे (सुख शांति धन और समृद्धि) प्रतिदिन ऐसा करने से यह शब्द मन्त्र बन जाएंगे और जीवन में सुख समृद्धि को बढ़ाएंगे!

खाली मन एक भूत की तरह होता है शून्य मन आनंद की अवस्था में होता है दोनों में बहुत बड़ा भेद है सभी इष्ट हमारे मन से रूप रंग लेकर हमें मिलते है वो हमारी ही चेतना के एक भाग होते है साधारण शब्दो में कहे तो अवचेतन मन इतना असीम है की वो एक ही समय में हज़ार रूप लेकर प्रकट हो सकता है मैंने इसे जाना है …मैंने शून्य अवस्था में बहुत कुछ देखा और ज्ञान को प्राप्त किया ….

अगले ब्लॉग में ……

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