अपने भीतर की आत्म ज्योति को प्रज्वलित करो- भाग 4 (Self Inner Lite The Baurn)

मनुष्य शरीर हो या कीट पतंग सभी के भीतर एक चेतना है जिसके कारण कीट पतंग या मनुष्य अपनी जगह से हिलता डुलता है और अनेक कर्म करता रहता है पृथ्वी के भीतर भी एक चेतना है सूर्य के भीतर भी वही चेतना है चेतना या शक्ति समान होती है पृथ्वी लगातार घूम रही है ऐसा पृथ्वी में मौजूद चेतना के कारण है सारे ग्रह क्रमबद्ध तरीके से ब्रम्हांड में मौजूद है वो एक दूसरे से नहीं टकराते अपनी अपनी धुरी पर सब मौजूद है यदि पृथ्वी सूर्य से टकराते हुए चलने लगे या चंद्रमा से टकरा जाये तो मनुष्य और सभी जीवो का क्या हाल होगा

कितु सभी अनुशासन में मौजूद है एक शक्ति से सब बंधे हुए है चेतना नहीं होती तो कोई जीवन भी नहीं होता कुछ भी नहीं होता जीवन है तो संघर्ष भी है सुख दुःख भी है जीवन नहीं तो कुछ भी नहीं शक्ति नहीं तो जीवन नहीं

मनुष्य और तमाम जीवो का शरीर अवचेतन शक्ति की अद्भुत योजना है इस शरीर में कोई रहता है जो साँस लेता है देखता है और पृथ्वी पर अनेक कर्म करता है शरीर के भीतर रहने वाला वो कौन है..?

शरीर के भीतर जो ऊर्जा है वो अनेक विटामिन मिनरल्स की वजह से है क्योकि शरीर का वो भोज्य पदार्थ है उसके बिना शरीर के सेल्स कमजोर होने लगते है किन्तु जो चेतना है जो सब कुछ महसूस कर रहा होता है वो कौन है…?

जो गरीबी अमीरी को महसूस करता है जो शारीरिक कस्ट और शारीरिक कमजोरी को महसूस करता है वो आखिर कौन है ..? जो शरीर के खराब या उसके अत्यधिक कमजोर होने के बाद उससे बाहर निकल जाता है …वो कौन है चलता फिरता शरीर अचानक से चुप क्यों हो जाता है …?

मनुष्य के भीतर ब्रम्हांड की सभी शक्तिया मौजूद है जो मनुष्य की चेतना है वही अवचेतन मन है उसके भीतर अनेक कोष है ना जाने कितने प्रकार के संस्कार है संस्कार इसलिए जिससे जीवन को कर्म गति मिल सके सभी यादेँ संस्कार बन जाती है जैसे किसी सीडी की डिस्क में अनेक गाने फिल्मे आदि होते है किन्तु वो दिखाई नहीं देते ठीक इसी प्रकार अवचेतन मन है जो सृष्टि का रचनाकर है और सृष्टि के प्रत्येक कण कण में बिद्यमान है

मौसम बदलता है युग बदलता है शरीर बदल जाता है किन्तु वो शक्ति हमेशा मौजूद रहती है क्योकि वो अजन्मा है मृत्यु से परे है अनंत है उसका स्वरुप वर्तमान है वही सृष्टि बीज है वो अद्वैत है यानि वो ही स्त्री है वो ही पुरुष है ब्रम्हांड में फैला अनंत शून्य ही उस असीम का अवचेतन मन है जो सभी जीवों के भीतर उपस्थित है वो ही सकारात्मक है वो ही नकारात्मक है कुछ भी कही अलग जगह से आ ही नहीं सकता

उस अनंत शक्ति की तरह ही उसके रहस्य भी अनंत है वो अपने आप मौजूद है उसका न आदि है ना अंत है वह अनेक रूपों में स्वयं उपस्थित होता है स्वयं ही विलीन भी हो जाता है मनुष्य रूप उसका एक बौद्धिक खेल है वही मुझमे और आप सभी में अनेक जीवन को जी रहा है

संसार के सभी सुख और दुःख सारे अनुभव एक भाव का रूप ले लेते है और ये सभी अवचेतन में संग्रहित होकर नए जीवन में फिर से उत्पन्न होते है इस क्रम के चलने का ही नाम जीवन है संसार के सभी विज्ञान और ज्ञान उस पेड़ में लगे फूल और पत्तो के सामान है जिस पेड़ की जड़ ही फूल और पत्तो का कारण होता है जड़ नहीं तो फूल पत्ते भी नहीं

संसार में मनुष्य की भीड़ में वही मुजरिम है वही ज़ज़ भी होता है वो सभी अवस्थाओ और रूपों में बिद्यमान है साधारण सांसारिक जीवन में इन बातो पर विश्वास नहीं होता क्योकि सांसारिक जीवन का उसका खेल बिलकुल अलग है संसार की रचना ही इसी लिए हुई है जिससे अनेक अनुभवों का जन्म हो सके

शेर का भोजन माँस है जबकि वह स्वयं माँस से ही बना हुआ है फिर भी वो मांस खाता है अनेक जीव जन्तु और बहुत सारे मनुष्य भी अनेक जीवो का माँस खाते है माँस पांच तत्वों से निर्मित है अग्नि वायु जल आकाश और पृथ्वी,जो मांस खाता है उसका शरीर भी इन्ही पांच तत्वों से निर्मित है चुकी मनुष्य का सांसारिक जीवन होता है और इससे मन भी मलिन होता है इसलिए माँस से दूर रहे तो अच्छा है मनुष्य शरीर के लिए अन्न की रचना इसी लिए हुई है वर्ना पृथ्वी पर अन्न का एक भी दाना नहीं होता माँस के शिवाय!

खाया हुआ माँस शरीर के माँस में जाकर मिल कर एक रूप हो जाता है जो पांच तत्वों से निर्मित है और वापस पाँच तत्वों में फिर से विलीन हो जाता है इसके बावजूद भी मैं मांसाहार को हितकारी नहीं कहूँगा क्योकि इससे मन के भीतर का नकारात्मक भाव प्रबल होता है सकारात्मक भाव के लिए मनुष्य के लिए अन्न और तमाम फल ही सर्वश्रेष्ठ भोजन है जीवन अनेक रंगो से सुसज्जित है लेकिन नकारात्मक रंग हमेशा ही बुरा होता है

चेतना को भोजन से कोई सरोकार नहीं होता क्योकि वो एक अनंत एक सम्पूर्ण शक्ति है भोजन तो शरीर को चाहिए होता है जिससे शरीर के सभी सेल्स क्रियान्वित और जीवित रह सकें! अनत शक्ति की वजह से ही ब्रम्हांड भी अनंत है ये उसका अपना एक साकार रूप है पृथ्वी आदि सभी ग्रह उपग्रह उस असीम चेतना की कल्पना और इच्छा से प्रकट है
मनुष्य अपने जीवन को जैसा चाहे बना सकता है मानसिक कर्म पहला कर्म है शारीरिक कर्म उस मानसिक कर्म की छाया मात्र है …

मनुष्य जीवन में दोनों कर्मो का एक रूप में एक साथ चलना जरुरी है समस्याएँ तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य सोंचता कुछ है और करता कुछ है या उसे विश्वास नहीं होता तब वो निरर्थक प्रयास करता है शारीरिक और मानसिक कर्मो की दिशा एक ही होनी चाहिए अलग, अलग नहीं! इस सृष्टि को देखिये सृष्टि के चक्र को देखिए अपने जीवन को देखिए क्या कुछ समानता है वैसे भी मनुष्य जीवन दुर्लभ जीवन है जो चीज आपके लिए सही नहीं होता वही चीज किसी और के लिए बहुत उपयोगी होता है ……
अगले ब्लॉग में …

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