अपने भीतर की आत्म ज्योति को प्रज्वलित करो -भाग 2 (Self Inner Lite The Baurn) दीपावली विशेष लेख !

ये सृष्टि जिसमे हम रहते है अद्वैत भावना से उत्पन्न है यहाँ हर चीज के दो रूप है दिन रात, जल अग्नि,सुख दुःख,सकारात्मक भाव नकारात्मक भाव , सर्दी गर्मी, नर मादा, आदि इसी तरह परम अवचेतन शक्ति का भी दो रूप है एक वो है दूसरा वो नहीं है! जब की वो है और सभी भौतिक अभौतिक रूपों में है सब कुछ उसी से उत्पन्न है और सब उसी में विलीन भी है

दीप जलाकर अँधेरे को मिटाना ही दीपावली है हम बाहर के अँधेरे को मिटाने का प्रयास तो करते है हम बाहर दीप भी जलाते है लेकिन क्या कभी अपने भीतर भी झांक कर देखा है की वहाँ कितना अँधेरा है रौशनी की जरुरत सबसे पहले वही है

अँधेरा चाहे भीतर का हो या बाहर का बस वो खतरनाक ही होता है रौशनी सिर्फ दीये की ही नहीं होती रौशनी विचारो की भी होती है मन के भावो की भी रौशनी होती है यदि ये प्रज्वलित हो जाये तो बाहर जीवन के सभी आयामों में रौशनी भर उठती है और जीवन के सभी अँधेरे दूर हो जाते है

दीपावली खुशियों का त्यौहार है इस दिन प्रभु श्रीराम बुराई के प्रतीक रावण पर विजय पाकर लंका से अयोध्या नगर को वापस आये थे और इस खुशी में अयोध्यावासियो ने घर घर दीप जलाकर प्रभु श्रीराम का स्वागत किया था! तब से प्रत्येक वर्ष ये दीपोत्सव पर्व मनाया जाने लगा अयोध्या से शुरू ये पावन पर्व कालांतर में पुरे भारत वर्ष में फैलता चला गया !

आज बढ़ती जनसँख्या के कारण दीपावली, त्यौहार के साथ साथ एक बहुत बड़ा व्यवसाय का कारण भी बन चूका है खैर,हमारी बातचीत यहाँ कुछ और है

जैसे किसी दीवार के पीछे क्या है हम तभी जान सकते है जब वो दिवार उस जगह से टूट जाय! किसी तालाब या झील के ऊपर जमी काई हट जाने के बाद उसके भीतर की स्वरुप हम देख सकते है जब तक दीवार या काई रहती है हम उस पार की सच्चाई नहीं जान सकते!

क्रोध लालच डर ईर्ष्या अनेक संस्कार नकारात्मक दृश्य ये सभी एक दीवार तथा काई की तरह ही होते है जो मनुष्य को उसके सच्चे स्वरुप से दूर रखते है प्रत्येक मनुष्य स्वयं सृस्टि है समस्त सृस्टि उसके रोम रोम में व्याप्त है!

जन्म लेते ही प्रत्येक मनुष्य का इस पृथ्वी पर कार्मिक यात्रा आरम्भ हो जाती है मन की प्रत्येक भावना और कल्पना सबसे बड़ा कर्म है पृथ्वी पर उपस्थित समाज से मनुष्य सीखता भी है और सामाजिक सिस्टम में उलझकर कर रह भी जाता है जब की सचाई ये है की समाज का प्रत्येक व्यक्ति न किसी से छोटा है ना किसी से बड़ा है सब एक जैसे है और सब बराबर है क्योकि सब एक ही सृस्टि से निर्मित है और एक ही सृस्टि के भीतर जीवन के खेल को खेल रहे है!

जो व्यक्ति स्वयं पर विश्वास रखता है उसकी जीत निश्चित होती है ! स्वयं का अर्थ अपने भीतरी आंतरिक शक्ति से होती है जो अपने भीतर झांकता है स्वयं को शक्तियुक्त मानता है किन्तु इसका अहंकार भी नहीं करता वही तो सच्चा कर्म करता है और वह सही दिशा की ओर आगे बढ़ जाता है तथा अपनी मंजिल को प्राप्त कर लेता है

जब कोई मनुष्य ध्यान करता है तो वह स्वयं से जुड़ जाता है जब मनुष्य किसी ईस्वर को पूजता है तो वह एक भक्त बन जाता है और जब वह किसी दूसरे मनुष्य की मदद करता है तो वह मनुष्य सेवार्थी कहलाता है!

जिस पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन जी रहा है !
जहाँ अशंख्य जीव जन्तुओ का निवास है जहाँ विशालकाय पर्वत झरने अनेक फूल पौधे है! जो पृथ्वी सत्तर प्रतिशत पानी में डूबी हुई है वो पृथ्वी ब्रम्हांड में लगातार घूम रही है और सूर्य की प्रक्रिमा कर रही है

ये सृष्टि एक अनन्त मन के द्वारा उत्पन्न है वो मन जो महसूस होता है किन्तु दिखाई नहीं देता ! उस असीम मन की एक भावना और एक कल्पना है ये सृस्टि ! मनुष्य और सभी जीव जन्तुओं का शरीर भी उसी की कल्पना है वही रचयिता है और वही सब में निवास भी करता है

चुकीं वो असीम मन सक्तिशाली और गुणहीन है एक सामान्य नजरो मेँ वो है भी, और नहीं भी! किन्तु वो है तभी तो चारो तरफ जीवन है! उस असीम मन का कोई रूप रंग नहीं है! वो अपनी सृस्टि व्यव्स्था के अनुसार अपना रंग रूप स्वयं पहन लेता है!

वो सब जगह है और सभी जीवों तथा मनुस्यो में है! इसलिए कोई भी मनुष्य कमजोर, गरीब और लाचार नहीं है ये सब एक मानसिक विकार है क्यों की जैसा मन होता है उस मनुष्य का जीवन भी वैसा ही होता है!

तमाम अज्ञान के अंधेरो में डूबा कोई भी व्यक्ति अपने भीतर कभी जा ही नहीं पाता! वो बस ऊपरी माया को ही सच मान कर अपना जीवन कष्टप्रद बना लेता है और इसके लिए वो भाग्य को दोष देता है ग्रहों को दोष देता है ईस्वर को गाली देता है! ऐसा अज्ञानी व्यक्ति यह नहीं जानता की वो किसी ग्रह को दोष नहीं दे रहा, किसी और को गाली नहीं दे रहा, बल्कि स्वयं को ही गाली दे रहा है!

यही जीवन का खेल है और प्रत्येक मनुष्य का अपने हिस्से का सारा खेल अपने भीतर संगृहीत सँस्कारो द्वारा खेलना पड़ता है! चाहे सँस्कार इस जन्म के हो या पिछले जन्म के !इस पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य खुशी प्राप्त करना चाहता है बहुत सारा धन प्राप्त करना चाहता है!

सृस्टि में खेल की व्यवस्था के अनुसार मनुष्य यह भूल जाता है की धन और सभी चीजे मनुष्य के अपने भीतर अपनी भावना में ही मौजूद है सब कुछ मन की भावना से ही उत्पन्न होता है! मन के खुल जाने से भाग्य के सभी रास्ते और सभी दरवाजे खुल जाते है ..
और आगे next ब्लॉग में….

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