अपने भीतर की आत्म ज्योति को प्रज्वलित करो ! भाग- 1 (Self inner Lite The Baurn)

मनुष्य क्या है मनुष्य का जीवन क्यों है..यहाँ किसी इष्ट की बात नहीं करेंगे आज कुछ विचार करेंगे …शुद्ध शक्ति जिसका स्वरुप कुछ भी हो नाम कुछ भी हो ..इससे क्या फर्क पड़ता है …बात केवल शक्ति की करेगे…

किसी एक व्यक्ति की सरचना को देखे ..उसका शरीर किसी दिन एक नन्हा सा सेल कोशिका था उस सेल कोशिका के भीतर एक पुरा मनुष्य का शरीर छुपा हुआ था वो कहा से आया किसी दूसरे मनुष्य के शरीर से …माँ के गर्भ से अनेक तरह के पोषण और सहयोग प्राप्त करके वो मांस का एक नन्हा सा पिंड बना!

कुछ समय बाद उस पिंड में एक शक्ति का प्रवेश हुआ जिसे हम चेतना या आत्मा कहते है …ये चेतना अपने साथ एक मन को लेकर आया अवचेतन मन यानि स्वयं चेतना ही अवचेतन मन है …

चेतना या अवचेतन में बहुत से संस्कार पहले से होते है माँ के गर्भ में उसकी चेतना माँ के मन से जुड़ जाती है माँ के गर्भ से ही शिशु के भीतर नए नए संस्कारो की आहुति होने लगती है

शिशु के पृथ्वी पर आ जाने के बाद नए जीवन के लिये उसे अनेक अनुभव प्राप्त होने लगते है और यही अनुभव उसके जीवन की दिशा तय करते है! आगे का जीवन उसके सँस्कारो पर आधारित होता है ये सब तो ठीक है किन्तु..

वो चेतना जो शिशु के भीतर आया तो कहाँ से आया किस लिए आया बिना चेतना के गर्भ का मांस पिंड सिर्फ एक माँस का पिंड भर ही रह जाता ! उसका जन्म नहीं होता ..वो हँसता नहीं बोलता नहीं चलता नहीं रोता भी नहीं ..

चेतना के आते ही भ्रूण का शारिरिक और मानसिक विकास क्यों होने लगता है आखिर ये चेतना है क्या..? अवचेतन मन है क्या ?

जब शिशु दूध पीता है या कोई चीज खाता है तो वो आमाशय में जाकर हजम हो जाता है ..यदि वो वस्तु शरीर के लिए लाभप्रद हो तो, अन्यथा वो उल्टियाँ करके उस बस्तु को शरीर से बाहर फेक देता है ..

चेतना जो साँस लेता है जो इस संसार को आखो के माध्यम से देखता है जो भोजन का पाचन करता है जो शरीर के खून को पुरे शरीर में घुमाता रहता है …जिसके शरीर से बाहर निकलते ही,शरीर,शरीर नहीं रह जाता बल्कि शव हो जाता है!और मनुष्य शरीर एक नाशवान बेकार मांस का पिंड हो जाता है

चेतना जो इस ब्रम्हांड का आधार है जो गतिशील है जो अनंत कार्मिक यात्रा पर है ..वो प्रत्येक मनुष्य औऱ जीवजंतु ही है

कोई मनुष्य लाचार और कमजोर नहीं है ..बस वो अपने कार्मिक यात्रा पर है उसे स्वयं को जानना होगा की वो कौन है और वो क्या क्या कर सकता है ..स्वयं को जाने बिना कुछ बड़ा हासिल नहीं होगा ..क्योकि बचपन से ही मन में बहुत सी हीनताएँ आ जाती है जो मनुष्य की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा होती है

मन के भीतर बहुत सी बकवास मान्यताएँ आकर बैठ जाती है झूठी मान्यताओँ से खुद को बचाना होगा अपनी छमताओं को पूरी तरह से खोलना होगा ..अपने भीतर की शक्ति पर विश्वास करना होगा और ये मनुष्य के स्वयं अपने मन के
द्वारा ही होता है

जो मनुष्य अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान लेता है जो स्वयं को जान लेता है ..उसके भीतर की शक्ति प्रज्वलित हो जाती है..ऐसे मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव नहीं होता
उसका प्रत्येक विचार सत्य हो जाता है वो हमेशा आनंदित और आशावान रहता है वो कभी निराश नहीं होता ! क्योकि वो स्वयं को पहचान चूका है उसके भीतर की सभी हीनताएँ मिट चुकी होती है

बाहर जो कुछ भी है उसकी उत्पति भीतर से हुयी है ..सब कुछ भीतर ही है ..सब कुछ शून्य ही है सब एक ऊर्जा है सब कुछ असीम चेतना का ही भाग है …अलग से कही कुछ भी नहीं! घास का एक तिनका भी अवचेतन मन का भाव है …समस्त जगत असीम अवचेतन मन का सिर्फ एक भाव है pyour intantion स्वयं को ना जानना ही अज्ञानता है अंधविस्वास है ! स्वयं को जाने …
और आगे अगले ब्लॉग में ….

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