शारीरिक और मानसिक बीमारियों को ठीक करने का आध्यात्मिक उपाय !(Mental And phisical cure all Problems)

स्वस्थ शरीर ही सब कुछ होता है चाहे वो मानसिक शरीर की बात हो या भौतिक शरीर की बाते हो स्वस्थ शरीर अनेक सुखो का कारण होता है तथा एक बीमार शरीर तमाम दुखो का कारण बनता है सामान्य बीमारिया जैसे जुकाम सर्दी की तो कोई बात नहीं किन्तु घातक बिमारियो से मनुष्य हर प्रकार से टूट जाता है

आज जितनी भी चिकित्सा पद्धति मौजूद है वो कुछ बीमारियों को ठीक तो कर देती है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं होती की वो बीमारिया उस मनुष्य को दोबारा नहीं होगी भविष्य में एक ही बीमारी का बार बार इलाज कराना पड़ता है ये बेहद दुखद अनुभव होता है

शरीर है तो बीारियाँ भी होगी ऐसी कहावत इस संसार में मशहूर है!क्यों नहीं ऐसी कहावते बनती की शरीर है तो वो निरोग भी रहेगा!यही नकारात्मक संस्कार है नकारात्मक मान्यताएं मनुष्य को बंदी बना लेती है और इंसान सुखद जीवन की सही कल्पना भी नहीं कर पाता!

शरीर की 95% बीमारियाँ मनोवैज्ञानिक होती है केवल 5% ही गलत आहार विहार के कारण बीमारियाँ मनुष्य शरीर में उत्पन्न होती है जिन्हे औषधि से ठीक कर लिया जाता है

यदि मनुष्य का मन और तन यानि पेट प्रतिदिन भली प्रकार से साफ़ स्वच्छ होता रहे तो मनुष्य का शरीर हमेसा स्वस्थ और मन हमेशा प्रसन्न रहेगा!किन्तु भाग दौड़ भरी जिंदगी में ऐसा संभव ही नहीं हो पाता! मन और शरीर दोनों के भीतर
कुछ कुछ ना कचरा भरा ही रहता है जो अनेक बीमारियों का प्रमुख कारण होता है

जीवन में अनेक संघर्ष करते हुए मनुष्य नाना प्रकार की मानसिक गतिविधियों से गुजरता है जिससे उसके शरीर की रोगप्रतिरोधक छमता कमजोर हो जाती है और उसे आये दिन बिभिन तरह की अनेक बीमारियों का भी सामना करना पड़ता है

हमारे मन की प्रत्येक भावना का असर सबसे पहले हमारे शरीर पर होता है फिर उसका असर बाहरी संसार पर पड़ता है योग विज्ञानं में शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियो का वर्णन है जिसमे इड़ा,पिङ्गला,सुषुम्ना ये तीन प्रमुख नाड़ीया है जो हमारे ब्रेन के कोर्टेक्स भाग से जुडी है

सुषुम्ना नाड़ी में पिछले सभी कर्म तथा समस्त भावनाएं यादो के रूप में बिद्यमान होते है इड़ा और पिङ्गला नाड़ीया बुद्धि तथा सम्पन्नता उत्पन्न करने की परिचायक होती है मनुष्य जो भी सुख दुःख तकलीफे आदि महसूस करता है वो बड़ी तेजी से इन तीनो नाड़ियो के माध्यम से पूरे शरीर में फ़ैल जाता है मनुष्य सरीर के भीतर मौजूद तैतीस ट्रिलियन सेल्स को ये मैसेज के रूप में सब भावनाएं प्राप्त होती है और सभी दैहिक सेल्स उसी अनुसार कार्य करती है

जैसे ब्रम्हांड में सूर्य बिद्यमान होता है ठीक उसी प्रकार से पिट्यूटरी ग्लैंड के पीछे प्रत्येक मनुष्य की आत्मा विद्यमान होती है आत्मा को जब ये लगता है की शरीर अत्यंत कमजोर हो चूका है तो वह किसी ना किसी बहाने वर्तमान शरीर को त्याग देता है

सुषुम्ना नाड़ी में सभी संस्कार अवचेतन मन से संग्रहित होते है जैसे किसी सीडी के डिस्क में सैकड़ो गाने और बिभिन्न फिल्मे मौजूद होती है किन्तु बाहर से वो दिखाई सुनाई नहीं देती है जब उन्हें एक सिस्टम के माध्यम से जोड़ा जाता है तो उसके भीतर का सब कुछ दिखाई वा सुनाई देने लगता है

मनुष्य के प्रत्येक विचार जीवित अवस्था में होते है लेकिन वो फलीभूत तभी होते है जब वो एक भावना बनकर अवचेतन में बैठ जाएं ! अवचेतन शक्ति को जीवन के हर पहलु में प्रयोग किया जा सकता है स्वास्थ्य की भावना से स्वास्थ्य की उत्पत्ति होती है!निरोग रहने की भावना से रोग ठीक होने लगता है क्योकि शरीर के प्रत्येक सेल को बेहतर स्वास्थ्य की सुचना प्राप्त होती है और वो शरीर के भीतर ठीक उसी तरह व्यवहार करने लगते है

किन्तु सकारात्मक की सोच भावनात्मक और स्थाई होनी चाहिए मात्र एक दो दिन के सकारात्मक रहने से कुछ नहीं होता ! क्योकि अभी अभी जो सकारात्मक का बीज आपने अपने मन में बोया है अगले दो दिन बाद नकारात्मक की अग्नि उस बीज को जला कर ख़त्म कर देती है और आप को लगता है की सब अच्छी बाते मात्र कोरी वकवास होती है

सभी शक्तिया अभौतिक रूप से मनुष्य के भीतर मौजूद होती है प्राण शरीर में सातों कुण्डलनी चक्र होते है जो हमारी शारीरिक बनावट के अनुसार सरीर के भीतर ही व्याप्त है सातों कुण्डलनी चक्र सात लोक होते है शून्य और सृस्टि भौतिक और अभौतिक समस्त ब्रम्हाण्ड सृस्टि का एक एक कण मनुष्य के भीतर बिद्यमान है इन्ही तत्वों से ही साकार जीवन का निर्माण हुआ है

सभी मनो रोग सभी दैहिक रोग संस्कार पर आधारित होते है ध्यान करने से जीवन ऊर्जा जब मूलाधार से ऊपर उठती है तो वो सभी संस्कारो को भस्म कर देती है मनोवृति बदल जाती है नया विश्वास उत्पन्न होने लगता है मनुष्य के ज्ञान की सीमा का विस्तार होने लगता है मनुष्य को स्वयं का ज्ञान होने लगता है उसकी सभी नकारात्मक मान्यताये बदलकर सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है

प्रत्येक दिन ध्यान करने से मनुष्य का चित्त आनंद से भर उठता है जिससे शरीर के भीतर सभी विजातीय द्रव्यों का परिगमन होने लगता है और शरीर के एक एक सेल्स और न्यूरॉन्स अच्छी तरह काम करने लगते है जिससे मनुष्य मनो रोग और घातक दैहिक रोगो से मुक्त हो जाता है

भीतर की Cosmic enargi यानि प्राणिक ऊर्जा अपनी सही अवस्था में आ जाती है और व्यक्ति चमत्कारिक रूप से सुखी और संपन्न होने लगता है!

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