शिवोहम, मेरा स्वयं का अनुभव और ईस्वरीय दर्शन ! (अजय कुमार)

आज मैं अपने कुछ विषेश आध्यात्मिक अनुभवों को नए तरीके से बहुत संछेप में प्रकट करने जा रहा हूँ इसलिए नहीं की मुझे ये उपलधि प्राप्त हुयी बल्कि इसलिए की जिन्हे अध्यात्म और अवचेतन की शक्ति पर विस्वास नहीं उन्हें मैं नयी दिशा प्रदान कर सकू!जिससे वो भी अपनी पवित्र किसी मनचाही योजना को साकार करने की दिशा में उचित कदम बढ़ा सके!
आगे जो भी मैं बताने जा रहा हूँ वो सभी घटनाये मेरे साथ घट चुकी है तथा लगातार घटती रहती है

आज मैं अपने जीवन की किसी भी घटना को अपने अनुसार घटित कर सकता हूँ!ऊपर से मैं बेहद नॉर्मल व्यक्ति हूँ किन्तु भीतर से सब कुछ बदल चूका है !और मुझे अध्यात्म के मार्ग पर चलते मात्र चार वर्ष ही हुए है मैंने स्वयं पर और अवचेतन शक्ति पर विश्वास किया और प्रतिदिन सुबह के पांच बजे तक बिस्तर से उठकर ध्यान की पवित्र क्रिया में बैठने लगा! शुरुआत में काफी डर लगता था जब चेतना मूलाधार से उठकर ऊपर सहस्त्रार की और जाने लगती है तो बेहोशी की दसा हो जाती है

शुरू में ऐसा लगता था जैसे प्राण उखड जायेगे किन्तु मैं अपने कार्य में सफल रहा आज मैं अपने अनुभव की कुछ ऐसी बाते शेयर कर रहा हूँ सायेद किसी को विश्वास न हो किन्तु मुझे पता है की मैं सत्य को उजागर कर रहा हूँ इसके लिए मैं अपने गुरु से माफ़ी और उनसे शक्ति की प्रार्थना करता हूँ!

क्या हो यदि आप बैठे हो अपने घर के भीतर, और आपके आस पास भटक रही आत्माये आपके सामने आकर बैठ जाये ठीक आपके सामने, तो आप क्या करेंगे!रात्रि के एक बजे के बाद कोई महिला आत्मा आपके सिरहाने बैठकर आपको कोई गीत सुनाने, लगे तब आप क्या करेंगे! मुझे पता है कोई मेरी बात पर विस्वास नहीं करेगा, जरा रुकिए…इससे बढ़कर अभी कुछ अनुभव और भी है

सुबह के सात बज रहे हो आपके भीतर से शिव बाहर निकलकर सजीव आपके सामने खड़े हो जाये और उस वक़्त आपका शरीर निष्प्राण सा पडा रहे और आप पूरी तरह से अपने सत्य रूप को धारण कर ले! यानि शिवोहम! मैं ही शिव हूँ यानि सभी मनुष्य शिव है सभी जीव जंतु शिव का ही बिभिन्न रूप है जब आपको इस सत्य का ज्ञान और दर्शन हो जाये तो आप क्या करेंगे!

आप धन प्राप्ति का एक मार्ग खोज रहे हो और अचानक ही आपको हर तरफ से धन की प्राप्ति होने लगे आपके पास धन के सभी दरवाजे खुलकर सामने आने लगे तो आप इसे क्या कहेगे, बिना लम्बे इलाज के आपके आधे शरीर का लकवा बहुत ही कम समय में पूरी तरह से हमेसा के लिए ठीक हो जाये तो आप इसे क्या समझेंगे!

यदि कोई कठिन परस्थिति भी आपके लिए बेहद सामान्य और छुद्र घटना में सीमित होकर रह जाये तो आप इसे क्या कहेगे

आपके घर में कोई भी व्यक्ति बीमार हो और आपकी एक प्रार्थना से वो ठीक हो जाये तो आप इसे क्या समझेंगे ! सिद्ध लोक से सिद्ध योगी जन आकर आपके सर पर हाथ रखकर आपको आशीर्वाद दे तो आप क्या करेंगे! आप सिद्धलोक और ब्रम्ह लोक तथा समस्त लोकों को अपनी आँखों से ज्यादा साफ साफ़ देखने लग जाये तो आप क्या करेंगे? ऐसी ना जाने कितनी घटनाएं सभी वर्णन कर पाना यहाँ कठिन भी है और ये आध्यत्मिक नियमो के खिलाफ भी है! चुकी आज मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लगा की कुछ बातो को बताया जा सकता है इसलिए मैं यंहा कुछ घटनाओ का उल्लेख कर रहा हूँ!और ये पहली तथा आखिरी बार है!

ये सब कैसे होता है इसको भी बताना यहाँ अब जरुरी है और ये उस प्रत्येक मनुष्य के साथ हो सकता है जो सच्चे मन से प्रतिदिन ध्यान कर्म करता है जो आस्थावान होता है तथा अपने मन को हमेसा योग की इस्थिति में रखता है

जब कोई मनुष्य सम्पूर्ण मन से प्रभात वेला में हर दिन ध्यान की गहरी अवस्था में बैठता है तो उसके मूलाधार रीढ़ की हड्डी के ठीक नीचे का हिस्सा, कुण्डलनी शक्ति जिसे दैवीय आदि शक्ति कहा गया है ऊपर उठने लगती है उस समय ऐसा लगता है जैसे प्राण उखड जायेगे किन्तु डरना मना है कुछ समय बाद ऊर्जा सामान्य हो जाती है कुण्डलनी के सभी छह चक्र खुल जाते है और आदि शक्ति मनुष्य सिर के ठीक ऊपर जहा चुटिया होती है वो ब्रम्ह्लोक स्थान है वहाँ पहुंच जाती है वहाँ शिव विराजमान है शिव और शक्ति का मिलन हो जाता है

मनुष्य का आज्ञाचक्र जिसे शिव का तीसरा नेत्र कहा जाता है वो भी खुल जाता है मनुष्य अब पवित्रता और आनंद की चरम अवस्था में पहुंच जाता है वो अब समस्त लोको की यात्रा करने लग जाता है उसे सिद्ध योगी जनो का आशीर्वाद प्राप्त होने लगता है वह जान जाता है की सृस्टि क्या है वो जान जाता है की मनुष्य और जीव जंतु तथा इस्वर सभी एक ही है!

इस अवस्था को शून्य या तुर्यावस्था भी कहते है यानि शाब्दिक भाषा में शिव अवस्था! या ईस्वरीय अवस्था!
सारे रहस्य खुल जाते है आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है व्यक्ति सुख दुःख क्रोध अहंकार लोभ मोह से ऊपर उठ जाता है उसके सभी मनोविकार ,दैहिक विकार , दूर हो जाते है उसका मन पवित्र और व्यापक हो जाता है ,
लेकिन यह सब इतनी आसानी से नहीं होता, ध्यान योग का तप सच्चे मन से करना होता है!

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