समस्त संसार मात्र इक भाव है (Hole universh is Only one intention )

ये समस्त संसार इक भाव है ! जहा हर दिन जीवन और मृत्यु का अनंत उपक्रम चल रहा है संसार की रचना संसार के रचने के भाव से हुयी है!एक अनंत शक्ति जो भक्त और भगवान दोनों स्वयं ही है और वो हर जग़ह कण कण में बिद्यमान है

मन के भीतर का प्रत्येक भाव एक कर्म होता है ! एक शक्ति से बिभिन्न रूपों और बिभिन्न शक्तियो की उत्पत्ति होती है!मूलतः सभी एक ही है!इसलिए मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं ही है!

समस्त ब्रम्हांड कर्म जाल की तरह है कोई भी कर्म से अछूता नहीं है मानसिक कर्म सर्वप्रथम और सर्वोच्च कर्म है क्योकि यह ईस्वरीय कर्म की तरह ही निष्पादित होता है समस्त ब्रम्हांड ईस्वरीय मानसिक कर्म का प्रतिफल है चूकि ईस्वर मनुष्य के भीतर भी है इसलिए मनुष्य ईस्वरीय गुणों से परिपूर्ण है किन्तु वो मनुष्य जीवन के कारण अज्ञानता के अँधेरे में होता है

अज्ञानता दुःख पीड़ा रोग भय क्रोध अहंकार लोभ मोह ही वास्तिक शैतान है! ये सब शैतान की मूल भावना है और शैतान का जन्म मन की भावना से ही होता है मन से दो प्रकार की शक्तियो का निर्माण होता है एक सकारात्मक यानि ईस्वरीय गुण तथा नकारात्मक भाव यानि सैतानी शक्ति !

दोनों एक मन से उपन्न होते है इसलिए इन पर नियंत्रण भी मन के द्वारा ही किया जाता है ये दोनों ही मन के भाव है
संसार की रचना एक असीमित मन के द्वारा की गयी है मनुष्य का मन उसका ही एक हिस्सा है और मनुष्य मन उस असीम मन के साथ हमेसा एक मन है

विस्वास ही आस्था है जिस प्रकार का विस्वास होता है पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य के अपने संसार की रचना भी ठीक उसी प्रकार की होती है विस्वास का अर्थ है की जो है बस वही है चाहे उसका रूप भौतिक हो या अभौतिक!

यहाँ सब कुछ अलौकिक है और सबकुछ गतिमान है शून्य जिसे हम खालीपन कहते है दरअसल वो एक असीमित मन है जो दिखाई नहीं देता लेकिन वो शून्य अवस्था में जागृत रहता है उस मन का यही रूप है और सब कुछ उसके भीतर होकर तत्पश्चात उसी में विलीन हो जाता है

एक नन्ही सी चींटी भी उस असीम मन का एक भाव है भाव यानि भावना उसके लिए चींटी क्या और विशाल पर्वत क्या सभी एक सामान है क्योकि की वही उन दोनों के भीतर बिद्यमान है

अपने मन के भीतर झाकिये और देखिये आपके भीतर कैसे कैसे भाव व्यवस्थित है यदि कोई भाव नकारात्मक है तो उसे तुरंत बदल दीजिये! मनुष्य जीवन बहुयामी जीवन है सभी आयामों के लिए शुद्ध और पवित्र भावना जरुरी है लोहे से खरे सोने की उम्मीद कैसे की जा सकती है

मनुष्य और जीव जन्तुओ के शरीर की रचना एक विचित्र और दुर्लभ रचना है इसका फार्मूला भी स्वयं असीम मन से गठित है असीम मन यानि एक अभौतिक शक्ति एक खालीपन जो स्वयं एक अनंत भाव है

यदि कोई व्यक्ति नाना प्रकार के कर्म के बाद भी गरीब ही रह जाता है तो इसका अर्थ है की वो अपने पिछले जन्म में अत्यंत धनी और संपन्न व्यक्ति रहा हो और इस जन्म में वो गरीबी का अनुभव करने के लिए पृथ्वी पर आया हो!

अनेक नकारात्मक भावो के कारण जब शैतानी शक्तियो का जन्म होता है तो शक्ति जिसे हम एक देवी के रूप में मानते है उनका भी जन्म होता है क्योकि वो संहारक होती है
चाहे मनुष्य हो या कोई अन्य जीव हो उसके जन्म के साथ ही उसके मृत्यु का भी जन्म हो जाता है जन्म और मृत्यु दोनों एक साथ जन्म लेते है और साथ साथ ही चलते है
बस अलग अलग समय पर वो घटित होते है

मन के भीतर का प्रत्येक भाव एक जीवंत दुनिया का रूप लेता है यदि उस में विस्वास हो तो वह घटना बन कर सामने आ जाता है जिस भावो के साथ विस्वास नहीं होता वो अनुपयोगी होता है भाव क्या है
भाव मन के चेतना है एक गहरा विस्वास एक गहरी आस्था ही एक भाव है चाहे वो सकारात्मक हो या फिर नकारात्मक !

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