धन का रहस्य ! (The Secret in mony and Gold)

धन क्या है जिस वस्तु को हम धन मानते है वो धन नही होता धन तो कुछ और ही चीज है जो उस वस्तु को प्रकट करती है जिसे हम इस संसार में धन के रूप में देखते और उसका प्रयोग करते आये है!

गोल्ड यानि सोना, सिल्वर यानी चांदी, तांबा,लोहा पीतल कॉपर आदि ये सभी मात्र धातुएं है ! जैसे कोई पत्थर सिर्फ एक पत्थर होता है जैसे कोई पेड़ सिर्फ एक पेड़ होता है सोना, चांदी इसलिए कीमती है और इसे धन के रूप में इसलिए जाना जाता है क्योकि इसका रंग बदलता नहीं और बहुत लम्बे समय तक उसी अवस्था में यह बरकरार रहता है तथा यह अनेक स्थानों पर बहुत कम मात्रा में पाया जाता है इसके रंग रूप के कारण इसे अति प्राचीन समय के लोगो ने एक बहुमूल्य वस्तु घोषित कर दिया था तत्पचात मनुष्य ने अपने जीवन विकास के साथ साथ इसके मूल्यो मेँ भी विकास करता गया, धन के रूप में इसका व्यापर बढ़ता ही रहा!

जिस मनुष्य के पास ये धातुएं अधिक मात्रा में होती है वो अधिक धनवान माना जाता है!किन्तु सोचने की बात यह है की क्या सचमुच ये वस्तुए धन है पैसा रुपया तमाम करेंसी क्या धन है नहीं ये मात्र एक वस्तु है धन नहीं! इनका बाज़ारीकरण होने के नाते इन्हे धन माना गया! जब की ये सब वास्तविक धन नहीं है ये सब तो मात्र काल्पनिक धन है!

अब प्रश्न यह है की धन वाकई ंमें कहा होता है और कैसा होता है !सोना चांदी और तमाम करेंसी धन का सिर्फ एक प्रतीक है ! किन्तु ये धन नहीं है! यह सभी मात्र एक वस्तु है जिन्हे धन मान लिया गया है जब की इनका धन से कोई रिस्ता नाता तक नहीं है ं इनसे धन का रिस्ता जोड़ देना अलग बात है!मेरे कहने का आशय अब सायेद आप समझ चुके होंगे!

जब हम किसी चीज को कुछ मानने लगते है तो कहाँ से मानते है सोचिये जरा, मेरे शब्दो पर ध्यान दीजिए आपको धन के रहस्य का पता चल जायेगा!हम किसी भी चीज को कहा से जानना शुरू करते है हम किसी भी बस्तु को कोई नाम कहा से देते है हम किसी भी बस्तु को उसे एक पहचान कैसे से देते है? यही प्रश्न ही समस्त धन का उत्तर भी है और रहस्य भी है!

सिर्फ बाज़ारी करण के नाते कोई वस्तु धन नहीं बन जाता ये तो एक सामाजिक क्रय – विक्रय की प्रक्रिया भर है! यदि किसी मनुष्य को सचमुच एक धनवान व्यक्ति बनना है तो इन वस्तुओ में धन को खोजना छोड़ दे! हमारे समाज मेँ बहुत बड़ी सं्या में अति गरीब स्तर के लोग रहते है क्या वो कठिन श्रम नहीं करते, सबसे ज्यादा श्रम एक गरीब व्यक्ति ही करता है सबसे अधिक परेशानिया भी वही झेलता आखिर क्यों ? क्या वो इंसान नहीं ? क्यों कुछ लोग अमीर होते चले जाते है …आखिर इसका मूल कारण क्या है यदि आप इसको ठीक से समझ गए तो मेरा दावा है की आपके सभी दिन और सभी रातें अमीरी से भरते चले जाएंगे!

जिस बस्तु को हम धन के रूप में पहचानते है वो सिर्फ एक वस्तु है धन नहीं! चुकी हमने मान लिया है की यही धन है तो वो हमें धन लगने लगा है और उस बस्तु या कागज के टुकड़े पर धन की अपनी आस्था हमने जमा ली है !
क्योकि उसका बाज़ारीकरण हो रहा है और उससे हम अनेक भौतिक वस्तुओ को खरीद और बेच पाते है!
जरा ठन्डे दिमाग से देखिये और गौर करिये की वो वास्तविक धन कहा है जिससे हम इन धन रूपी कागज के टुकड़े या सोना चांदी के रूप अनेक बहुमूल्य धातुओं को प्राप्त करते है!

हमारे मन की धन प्राप्ति की भावना ही बाहरी धन है यदि आपके मन में धन प्राप्ति के लिए प्रबल भावना नहीं है तो धन आपको छू कर आपके बेहद करीब से उधर निकल जायेगा जहा से उसकी प्राप्ति के लिए कोई प्रबल भावना मौजूद होगी! आपको पता भी नहीं चलेगा , और आप धन प्राप्ति के अनेक अवसरों से चूकते चले जायेगे! क्या किसी ने यह सोचा हैं की उसके आसपास के बहुत सारे व्यक्ति धन कहा से कैसे पाते है उनको धन प्राप्ति के तमाम अवसर कैसे मिल जाते है ?

मेरी बाते कडुई लग सकती है किन्तु मेरे दोस्त जो सच है मैं उसे ही उजागर कर रहा हूँ! मन की भावना में जो भी कोई चीज होती है वही घटित होता है चाहे वो धन हो या कुछ और! यही धन प्राप्ति का रहस्य है अभी आपको अधिक धन प्राप्ति का विस्वाश नहीं है आपको उतना ही मिल रहा है आपको उतने ही अवसर प्राप्त हो रहे है जितना आपके भीतर आपके अपने मन में है !

धन भी एक आस्था और अध्यात्म से जुड़ा गहरा विषय है जब हम अपने किसी काम धंधे में बरकत की बात करते है तो हम अध्यात्म की बात कर रहे होते है,सब कुछ अध्यात्म ही तो है! वास्तविक धन आपके मनकी धन प्राप्ति की भावना ही होती है जो बाहरी धन को किसी न किसी तरह से खींच कर आपके जीवन में लेकर आती है!

अज्ञानी मनुष्य ऊपरी तौर पर धन के लिए अत्यधिक श्रम करता रहता है लेकिन उसके भीतर चल रहे अविश्वास के भाव ही धन प्राप्ति के सबसे बड़े अवरोधक होते है ! हमारा अवचेतन मन इतना अद्भुत और शक्तिमान है ये जिस चीज को अपने पास महसूस करता है जिसे सच मानता है वही सच हो जाता है

धन की भावना ही बाहरी धन है, गरीबी की भावना सिर्फ गरीबी को उत्पन्न कर सकती है, धन सोने या चाँदी या कागज के नोटों में नहीं होता, धन हमारे मन में होता है ये जितनी मात्रा में हमारे मन के भीतर होता है ठीक उतनी ही मात्रा में हमारे बाहरी जीवन में होता है!

जितनी मात्रा में धन चाहिए,उसकी एक गहरी कल्पना अपने मन में उत्पन्न करे, उसको अपने पास ही महसूस करे उसको सजीव रूप से अंतर्मन से महसूस करते रहे उस धन को अच्छा धन माने हर दिन इसकी आदत बना ले विस्वाश ही आस्था है, विस्वाश बनाये रखे, कुछ समय बाद ही आपको ऐसे ऐसे रास्ते मिलने लगेंगे,जो अधिक धन प्राप्ति में सहायक होंगे, बहुत से अनेक ऎसे व्यक्ति मिलेंगे जो आपकी कल्पना को सच कर देंगे!

लोग गलतिया ये करते है अपने प्राप्त हो रहे अवसरों को पकड़ते नहीं , कही न कही वो संतुस्ट हो जाते है या आलसी हो जाते है , रहस्य ये भी है की जिस धन की कामना आप कर रहे है वो आपको उसी स्तर का कर्म भी आपसे करवाता है और उसका अवसर भी प्रदान करता है वो पहले आपको उस धन को सभालने लायक बनाता है उस स्तर के अनेक मनुस्यो से आपकी मुलाकात करवाता है आपके जीवन में अधिक धन प्राप्ति के रास्ते बनते चले जाते है और आप अमीरी के उस मंजिल पर पहुंच जाते है जिस मंजिल की ख्वाहिश आपने की थी! आपके मन की धन प्राप्ति की प्रबल भावना ही बाहरी जगत में आपके लिये उस धन को उत्पन्न करती है जिसे आप धन मानते है यही धन का रहस्य है !!

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