ये किनारा वो किनारा (एक कविता)

मन की अभिव्यक्ति गूंज रही थी कानो में जाने कब से मैं खोया था वीरान से मकानों में विचलन हुआ कही जब भीतर मैं, भूल गया जग सारा जाने कैसे मिल गया ये किनारा वो किनारा !! कुछ चित्र विचित्र पलकों के भीतर आधी आधी नींद के नीचे अलसाए से रहते है शब्दो की स्याही… Continue reading ये किनारा वो किनारा (एक कविता)