अदभुत बैंक!(Amezing Bank)

एक बैंक के भीतर बिभिन्न प्रकार के अकाउंट होते है ! इसके बारे में सभी को पता है!ये कोई नयी बात नहीं है!बैंक का नियम है की इसमें आप जो डिपॉज़िट करोगे कुछ समय बाद वापसी में आपको वही ज्यादा मात्रा में प्राप्त होता है!
इस संसार में हर चीज के पीछे एक नियम लागू है !

फिर चाहे वो धन का बैंक हो या मन का बैंक हो दोनों एक समान कार्य करते है! मनुष्य मन के भीतर जो कुछ जमा होता है मनुष्य को वापसी में वही अधिक मात्रा में प्राप्त होता है!बहुत से लोग लॉजिक लगाते है की ये सब वकवास है !
मन के भीतर जमा अपना धन वो इसी तरह प्रात करते है फिर भी वो समझ नहीं पाते या समझने की कोशिस ही नहीं करते!

दोस्तों लॉजिक हर जगह हर किसी विषय पर लगाया जा सकता है,लेकिन आप स्वयं से कितनी दूर तक भाग सकते हैं! एक समय ऐसा भी आता है जब सारे लॉजिक धरे रह जाते है !मनुष्य को एक ही दरवाजा नज़र आता है अनंत का !मैं स्वयं इसका भुक्त भोगी हूँ इसलिए ये मेरा मनपसंद टॉपिक है !कभी मैं इतना ज़्यादा निगेटिव हुआ करता था किसी भी ध्यान पूजा पाठ को नहीं मानता था किसी परा शक्ति में मेरा कोई विश्वास ना था ! एक बार क्रोध में आकर मैने अपने घर के मंदिर को तोड़, फोड़ कर घर से बाहर फेक दिया था ..किंतु…

कि एक घटना ने मेरे भीतर की सभी मान्यताओं को पूरी तरह से बदल कर रख दिया!इसके बारे में जानने के लिए मेरा पिछला पोस्ट(मेरा अनुभव) को देखे!यहाँ हम आगे की बात करेंगे!दोस्तों विश्वास बहुत बड़ी शक्ति है ये आपके लिए बहुत कुछ कर सकती है!

मन के भीतर जो कुछ भी आप जमा करते है आपको उसी की प्राप्ति होती है! इसके लिए किसी विशेष पूजा पाठ की जरुरत नहीं है,सृष्टि का नियम सबसे सुप्रीम है पूजा पाठ नहीं आप के मन को निर्मल और आस्थावान होना चाहिए!

मैंने अपनी जिंदगी में ऎसे लोगो को देखा है जो किसी देवस्थान पर कभी गए ही नहीं कभी धुप बत्ती तक नहीं
जलाई किन्तु वो जीवन के तमाम स्तरों पर बेहद सफल रहे!
यहाँ सिर्फ उनके मन के विस्वास ने सारा काम कर दिखाया !
उन्होंने अनजाने में अपने मन में वही चीजे जमा करी जो उन्हें अधिक मात्रा में चाहिए थी! वो अपने अवचेतन मन में सिर्फ मनचाही चीजों को ही बोते रहे!,एक सीधा रास्ता ही किसी को जल्दी कही पहुँचा सकता है!

मनुष्य मन में दबा हर विचार दृश्य और भाव एक बीज का काम करता है!एक कहावत बड़ी सुंदर प्रचलित है कि.पेड़ लगाया बबूल का अब आम कहा से होय!कहावते ऐसे ही नहीं बनी है!

इस धरती पर जीवन निर्वाह के लिए जीवन ही काफी है ये अपने जरुरत की सामग्री को ढूँढ ही लेता है किन्तु समय बदल चूका है अब थोड़े धन से जीवन निर्वाह होना कठिन है! इसलिए इसकी मैग्नेटिक जड़ तक पहुंचना जरुरी है !
और वो मैग्नेटिक जड़ है मनुष्य का अपना मन!

स्वयं की पढाई कितनी आवश्यक है ये मैंने जीवन के 36 वर्ष गुजार देने के बाद जाना!क्यों कि मेरे सारे हर्ष,उल्लाश विषाद, हमी से है!अपने जीवन का उत्तरदायी मैं स्वयं हूँ

मनुष्य सब कुछ जानता है बस स्वयं के आलावा ! बाहर की पढाई में भीतर के पन्ने अधूरे रह जाते है जहाँ से सब होना होता है!इसी लिए सफलता कुछ लोगो तक ही ठहर सी जाती है !

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