￰अभ्यास का जीवन (Praictis In Hole life)

हमारा जीवन अभ्यास का जीवन है यदि आप संसार को ध्यान से देखे तो पाएंगे की सब कुछ एक अभ्यास की तरह चल रहा है ..रोज सुबह का होना रात्रि होना .सर्दी गर्मी आंधी बरसात ..तूफ़ान सब कुछ प्रकृति का अभ्यास ही तो है!मनुष्य और सभी जीव भी इससे अलग नहीं है सभी अभ्यास में लीन है !

अभ्यास की व्याख्या अनंत है जब कोई मनुष्य बहुत सकारात्मक नज़र आता है तो उसके इतना सकारात्मक होने के पीछे कई वर्षो का उसका स्वयं का अभ्यास होता है!ठीक इसके विपरीत यदि कोई मनुष्य बहुत नकारात्मक है तो ये उसके बचपन से शुरू हुआ अभ्यास होता है..मनुष्य का चेतन मन बहुत ग्रहण शील होता है वो जो कुछ देखता सुनता है सब उसके अवचेतन में संस्कार बनता चला जाता है..सकारात्मक बनना एक प्रयास है नकारात्मक बनने के लिए कोई विशेस प्रयास की जरुरत नहीं होती!

जब मन के भीतर सकारात्मक भाव न हो तो नकारात्मक भावनाये स्वयं उत्पन्न हो जाती है!मन की विडंबना ये है की ये कभी शांति से नहीं रहता क्योकि मन एक ऊर्जा है! इसे ज्यादा देर तक कण्ट्रोल नहीं किया जा सकता ऐसा प्रयास करने पर ये पागल बना देता है!

मन को कुछ काम दिया जा सकता है! मन को यदि एक दिशा दे दी जाय तो ये बहुत अच्छे परिणाम लाता है !ऊर्जा बहुत शक्तिसाली होती है हमारा मन असीम ऊर्जा का भंडार है! यकीन करिये ये इतना बलशाली है की ये समस्त सृस्टि को कुछ ही पल में नस्ट कर सकता है! यदि ये अपने उस केंद्र पर जाकर ठहर जाये जिस केंद्र बिंदु से इस सृस्टि की उत्पत्ति हुयी थी! शिव का तीसरा नेत्र अवचेतन मन के भीतर ही समाहित है!मनुष्य रूप में उस नेत्र या शक्ति को जाग्रत करना सर्वथा असंभव है! आज्ञा चक्र से हम अभौतिक चीजे देखते है! जो मनुष्य के ललाट के ठीक पीछे स्थित है !

जितनी भी भौतिक चीजे है ये सब अभौतिक है!अभौतिक के गोंद से ही सभी भौतिक चीजे उत्पन्न है!जहाँ कुछ नहीं होता वही सब कुछ होता है!यदि किसी मनुष्य के जीवन में धन का अभाव है तो इसका सीधा सा मतलब ये है की उसके मन में धन प्राप्ति की वो पवित्र भावनात्मक विश्वास नहीं है जिससे धन उसके जीवन में आये! ऐसे धन तो उस मनुष्य के चारो तरफ मौजूद रहता है किन्तु उचित धन उसके जीवन में नहीं है!यदि आप किसी चीज पर विस्वास ही नहीं करेंगे तो वो आपके जीवन में भला कैसे आ सकता है.??..

जीवन का नियम विस्वास का नियम है विश्वास ही धन है सफलता है जीवन आदि है!विश्वास अवचेतन शक्ति है मनुष्य का अपना हर विश्वास ही उसका ईश्वर है!ऊर्जा की व्याख्या करना कठिन है क्योकि ये असीमित है और मन के भीतर तथा मन के बाहर हर जगह विद्यमान है! ऊर्जा ही भौतिक है और ऊर्जा ही अभौतिक है!सारा खेल बस इस ऊर्जा का ही है आप इसे चाहे जिस रूप में देखे या पुकारे!लोग इसे अनगिनत नामों से जानते तथा पुकारते हैं!

ऊर्जा भी अभ्यासरत है! अपने जीवन को अपने तरीके से बनाने के लिए अपने पिछले अभ्यासों में बदलाव करें!
अपने मन के भावो को बदलने का अभ्यास करें! यदि निगेटिव विचार बार बार आये तो तुरंत ही सकारात्मक विचारो से उन्हें काटे! ऐसा तब तक करते रहे जब तक की मन को सकारात्मक भावों की आदत न हो जाए!क्योकि नकारात्मक भाव उत्पन्न करने वाले तमाम एलिमेंट्स हमारे चारो तरफ हर वक़्त उपलब्ध रहते है!

आप हर दिन ब्रश करते है अच्छे कपडे पहनते है, सभी से अच्छा व्यवहार करते है!भोजन आदि करते है किसी को किसी प्रकार की नशे की आदत है आदि! अब आप इन्ही अभ्यासों में एक अभ्यास हर दिन शुरू कर दें! पवित्र भावना का अभ्यास आपका इसमें कुछ भी नुक्सान नहीं जबकि फायदे हज़ार है!

मन की प्रत्येक भावना पवित्र तब होती है जब मनुष्य स्वयं से प्रेम करने लगता है अभी तक आपने स्वयं से प्रेम नहीं किया यदि ऐसा होता तो आप पूरी तरह से सकारात्मक व्यक्ति होते !आपको नशे की लत नहीं लगती आप सभी को अपने जैसा ही समझते,किसी से वैर नहीं होता ..मनुष्य निगेटिव स्थिति में किसी को कुछ नहीं समझता वो अपने जीवन को हर पल दाँव पर लगाए रखता है ..स्वयं से सच्चा प्रेम करे फिर आप पाएंगे की संसार आप ही जितना अच्छा है!

Intention मन के भाव ही सब कुछ है!इस जीवन को यदि सफल बनाना है या कोई विशेस सफलता हासिल करनी है तो उसी प्रकार का भाव उत्पन्न करना पड़ता है! बिना उचित भाव के सभी प्रयास निरर्थक होते है! सब कुछ अपने भीतर ही उपलब्ध है उसे खोजना कर बाहर लाना अपना काम होता है !

आप स्वयं को ऐसा बनाये की आप जो चाहते है तो बस वही चाहते है! आप जो कल्पना करते है आप बस वही कल्पना करते हैं! आप स्वयं को सफल करना चाहते है तो आप बस सफलता ही चाहते हैं! इसके आलावा और कुछ नहीं! सही रास्ते का चुनाव कर आगे बढ़ जाये! इसके लिए मानसिक अभ्यास जरुरी है! अभ्यास से ही सब संभव हो पाता है!

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