संसार चल-चित्र!

ये संसार बहुत मायावी है, किंतु ये संसार जीवों की उपस्थिति से पूर्ण संसार बनता है!यहाँ ऊर्जा को छोड़कर सब कुछ नश्वर है!ऊर्जा जो अंतहीन अनंत है जो होकर भी दिखाई नहीं देता!

ये ऊर्जा कोई सामान्य शक्ति नहीं है! इसके भीतर बुद्धि का अनंत भण्डार है! जब ये तमाम जीवो का रूप लेकर प्रकट होता है तो अनंत काल के लिए जीात्मक यात्रा शुरू हो जाती है! जैसे एक पुरुष और एक स्त्री के कई रूप होते है!एक ही पुरूष पिता भाई पुत्र के रूप में होता है! एक
स्त्री, पत्नी, माँ पुत्री, दादी, बहन आदि रूपों में होती है!
ठीक इसी तरह वो असीम ऊर्जा कई योनियों को धारण कर साकार रूप में आता है!

वो एक सॉफ्टवेयर की तरह हर वक़्त उपलब्ध रहता है! सायेद इस बात पर यकीन ना हो किन्तु ये सत्य है की मनुष्य के भीड़ में वो ही मुजरिम होता है वो ही जज भी होता है !
ये विडंबना समझ से परे है किन्तु सत्य तो सत्य है !
जीव जगत की रचना का एक ही उद्देश्य है वो स्वयं ो इस तरह महसूस करना!

ऊर्जा हमेशा गतिशील होती है ऊर्जा का कार्य है क्रिया करना !इस लिए वो परम ऊर्जा अनेक रूपों में गतिमान रहती है !उसे हम अनेक नामो से पुकारते है! समस्त जीवो का शरीर नस्वर किन्तु मायावी है!ऊर्जा जब कोई चीज विचार करती है तो एक मन का निर्माण होता है! ऊर्जा के स्वयं के होने का आभास होता है जिसे हम विस्वास कहते है ! जब किसी चीज पर विश्वास किया जाता है तो ऊर्जा की समस्त शक्ति उसमे प्रवाहित होने लगता है! जिससे वो विस्वास संसार के परदे पर साकार हो उठता है!

मनुष्य को किसी भी विपरीत परस्थिति में घबराना नहीं चाहिये! विपरीत और भयंकर प्रस्थितियाँ भी नस्वर होती है कुछ समय बाद वो भी नस्ट हो जाती है!हमेसा साहस से
काम ले और विश्वास रखे की जो भी कुछ हो रहा है वो सब अपने अवचेतन में व्याप्त संस्कारो की वजह से हो रहा है!आपको ध्यान योग क्रिया से अपने अवचेतन के समस्त विकारों को मिटाकर शुद्ध कर लेना चाहिए!मन जब साफ और निर्मल हो जाता है, तो मन के भीतर स्वयं और संसार के प्रति मंगलकारी योजनाए, शुभ कारी भावनाये शुद्ध विचार जन्म लेने लगते है , जिससे कुछ ही दिनों में मनुष्य का समय और उसकी प्रस्थितियाँ बदलने लग जाती हैं!

संसार एक चल चित्र है! यहाँ जो कुछ भी हो रहा है सब नस्वर है,इसलिए धन शरीर भौतिक वस्तुए भी नश्वर है जो कुछ भी सृस्टि से कामना और कर्म करने से प्राप्त हो, उस में सुखी रहना ही जीवन की प्राथमिकता है!किसी भी मनुष्य को भलाई का काम करने के लिए या अपने जीवन को व्यतीत करने के लिए करोड़ो रूपये नहीं चाहिए उसके लिए लघु धन ही काफी है!

हा आप चाहे तो जितना भी कमाए ये अलग चीज है !किन्तु सही रास्ते से कमाए ,यदि आपको विश्वास हो तो प्रकृति आपको बहुत कुछ देने को तैयार है और प्रकृति कही दूर नहीं हर मनुष्य के भीतर ही है,जिसे हम अवचेतन मन कहते है! जीवन का नियम विस्वास का नियम है!हमारी विडंबना ये है की जो कुछ भी हम साकार स्थिति ंमें देखते है बस केवल उसी पर विस्वास करते है!

साकार जगत तो है ही वो तो दिख ही रहा है उसपर विस्वास करने से क्या फायदा विश्वास का सही मायना ये है की मनुष्य उस चीज पर विस्वास करे जो है ही नहीं,जो ऊर्जा या जो धन वस्तुए आदि दिखाई नहीं देती,उनके होने के भाव को विस्वास कहते है! तभी तो वो चीजे साकार होगी और जीवन में घटना का रूप लेगी!विस्वास अवचेतन का एक गहरा पूर्ण भाव है जो स्वयं अवचेतन है इस लिए वो भी परम ऊर्जा का ही रूप है,इस लिए विश्वास साकार रूप को धारण कर लेता है!

गरीबी एक मानसिक विकार है इससे ज्यादा कुछ नहीं! मन की अवस्था बदलते ही जीवन की व्यवस्था भी बदलने लगती है! अफ़सोस इस बात का है की बहुत सारे मनुष्य हर दिन कठिन शारीरिक श्रम तो करते है लेकिन मानसिक कर्म से बचते है यदि केवल कठोर शारीरिक कर्म से ही बहुत सारा धन मिलता तो आज एक भी मजदुर,गरीब नहीं होता सभी अत्यंत धनवान होते!

शारीरिक कर्म का अपना बड़ा महत्व है किन्तु किये जा रहे शारीरिक कर्म को अधिक रूप से फलित करने के लिए और अधिक अवसर प्राप्त करने के लिए मानसिक कर्म भी बहुत जरुरी है!मानसिक कर्म का मतलब ये नहीं की कही ऊपर से धन की वरसात होगी! आपको ऐसा करने के लिए अवधूत यानि जीरो मानसिक स्तर पर जाना होगा महान तपस्वी ही ऐसा कर सकते है सांसारिक व्यक्ति मन के उस स्तर तक जा ही नहीं पाता,जहा वो सृस्टि के किसी भी एटम को इन्फ़्लुएंस करके उसे मनचाहे रूप में बदल सके!

मनुष्य अपने साधारण जीवन में अवचेतन के योग से धन के अवसरों को बढ़ा सकता है अमीरी को पा सकता है ! मनुष्य इतना आलसी हो जाता है की सब कुछ वो जादू की भांति पाना चाहता है! और वो भी हो सकता है परन्तु उस मानसिक स्तर पर पहले पहुँचो तो!

यह संसार एक नाट्य मंच है और हम सभी उसका एक हिस्सा है! अपना अपना रोल निभाकर कर एक दिन शून्य हो जाना है इस लिए हमेसा हर प्रस्थिति में खुश रहे ! खुशी से खुशी उत्पन्न होती है दुख से दुःख और भी बढ़ता है !क्यों की मन के भीतर की हर भावना अपना विस्तार बड़ी तेजी से करती है!

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