जीवन का जन्म!रहस्य!(Birth a Secret life)

किसी महिला के गर्भ में विकसित हो रहे भ्रूण को जब लगभग चालीस से अड़तालिस दिन हो जाते है,तो एक अवचेतन मन जिसे हम आत्मा या प्राण कहते है वो पारदर्शी रूप में आता है और महिला के नाभि केंद्र से उस भ्रूण के भीतर प्रवेश कर जाता है!

उसके प्रवेश करते ही भ्रूण के दिल की धड़कन शुरू हो जाती है!भ्रूण एक शिशु में परवर्तित हो जाता है !
इससे पहले वो भ्रूण सिर्फ माँस का एक पिंड भर होता है!उसके भीतर कोई जीवन नहीं होता !

यदि किसी महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण के भीतर अड़तालिस दिनों के बाद भी,कोई जीवन प्रवेश नहीं करता तो देर से आनेवाला जीवन एक महान उद्देश्य वाला जीवन होता है उसके संकार बहुत अलग होते हैं!

चेतना जन्म लेने से पहले माता,पिता को परिवार स्थान और वातावरण को चुनती है! ऐसा वो अपने संस्कारो के आधार पर करती है! नौ माह बाद जब वो पृथवी पर कदम रखता है तो अपने सिर के ऊपर ब्रम्ह रन्ध्रा स्थान को अस्थि रहित रखता है जो सर के ऊपरी भाग में गोलाई सामान एक नरम तलवा होता है! ऐसा वो इसलिये करता है की किसी विशेष
परिस्थिति में वो उस शरीर को छोड़ कर जा सके!

समय बीतने के साथ उस जीवन का लगाव माँ तथा परिवार के दूसरे सदस्यों से होने लगता है जिससे फिर वो वही रुक जाता है !तीन वर्ष की उम्र तक उसे अपने पिछले जीवन के बारे में पता होता है किन्तु ब्रेन के भीतर हो रहे बदलावों की वजह से वो अपना पिछला जीवन भूल जाता है और नए जीवन को वह पूरी तरह से आत्मसात कर लेता है!

चेतना अवचेतन होती है जो शून्य से आती है अपने बुरे संस्कारों को मिटाकर जीवन का अवलोकन करने! नए जीवन के नए संस्कारो में वो फिर से उलझ कर रह जाती है !
इस तरह एक अंतहीन यात्रा का वो हिस्सा बन जाती है! मनुष्य शरीर को धारण करने के बाद उसकी अलौकिक शक्तिया संस्कारो की छाया में दब जाती है !

और ये अवस्था ही अज्ञान की अवस्था को जन्म देती है! अवचेतन जो सर्वसक्तिमन है मनुष्य शरीर में अपनी सक्तियो को समेट लेता है!इसी को माया कहा गया है!अवचेतन अपने साथ सात महा आयामों(लोक) लेकर आता है जिसे हम कुण्डलनी कहते है!
वास्तव में सातों कुण्डलनी सात लोक होते है और इनमे समस्त सृस्टि,जन्म मृत्यु का सार छुपा होता है इसलिए
ध्यान की गहरी अवस्था में सारा ब्रम्हांड सारे लोक परलोक
आँखों से ज्यादा साफ़ और स्पस्ट दिखाई देते है!

अवेतन चेतना दो रूपों में जन्म लेती है!एक स्त्री रूप में तथा पुरुष रूप में!ये दोनों रूप उस एक ही चेतना के दो भाग होते है!और दोनों भाग एक दूसरे मेँ विलीन होते है!विशेष परिस्थितियों में ये अलग अलग रूपों को धारण करते है!जिन्हे संसार शिव और शक्ति के नाम से जानता है !

कर्म यानि संस्कार के आधार पर अवचेतन को अलग अलग योनि में जाना पड़ता है! जैसे पशु, पंछी,जल चर आदि अवचेतन शक्ति व्यापक है समस्त शून्य ही अवचेतन है ये कुछ भी निर्माण कर सकती है,एक ही समय में न जाने कितने रूपों में जन्म ले सकती है!

सिद्ध योगियों ने इसे ईस्वर का व्यवसाय बताया है समस्त खेल जगत ईस्वर का है ईस्वर ही बार बार जन्म लेता है और मृत्यु का वरण करता है!ईस्वर के जगत में उसके सिवा कोई और दूसरा कैसे हो सकता है!वही अनंत है अजन्मा, जो है भी और नहीं भी है!

इंसान के रूप में हमें अपने कर्मो पर ध्यान रखना चाहिए कर्म ही संस्कार बनते है जो हमारी आगे की दिशा तय करते है!जिसे हम बाहर खोजते है वो हमारे पास हमारे भीतर होता है!जो कुछ भी हम चाहते है उसकी आहुति हमारे भीतर होती है!हर अँधेरे की रोशनी हमारे ही भीतर विद्यमान है!
रास्ता भीतर से ही मिलता है!

और हम अज्ञानता वश बाहर ही भटकते रह जाते है! स्वयं को जानना होगा! जिससे हमारा भटकाव रुक सके और हम अपने भीतर की दिव्य रोशनी के सहारे आगे बढ़ सके!
बाहर खोजना ही अंध विश्वास है!बाहर की सभी चीजें नश्वर है! भीतर एक असीम है एक शास्वत सत्य है!उस तक हमें स्वयं ही पहुंचना होता है!

4 thoughts on “जीवन का जन्म!रहस्य!(Birth a Secret life)”

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s