अलौकिक सृस्टि ! (Devine,a Nature)

इस संसार में एक सुई भी अपने आप नही बनी ,किसी ने इसकी खोज की इसकी परिकल्पना की तब जाकर एक सुई का निर्माण हुआ!

और ये प्रकृति जिसमे अरबो तारे,सूर्य चंद्र ब्लैक होल्स गैलेक्सी जीवित अवस्था में मौजूद है,इसमें होने वाली सारी गतिविधि क्या मात्र एक स्वमेव क्रिया है, क्या सब कुछ अपने आप हो रहा है!इस प्रकृत के प्रत्येक गतिविधि का सीधा असर हम सभी पर होता है!

हम आज जिस प्लैनेट पर है जिस पर चलते है सोते है जागते है, अपने हिस्से के सारे काम करते हुए अपना जीवन बिताते है! ये प्लेनेट हर पल अपनी एक धुरी बना कर लगातार सू्य ग्रह के चक्कर लगा रहा है!

ये ग्रह ऐसा क्यों कर रहा है!सारे ग्रह एक दूसरे से टकराते हुए चले तो क्या होगा,,सारे ग्रह अपनी अपनी राह पे ही क्यों चल रहे है!किसी का उनपे कमांड है सायेद, एक उल्का पिंड भी हमारी पृथ्वी से टकरा जाये तो पृथ्वी जल मग्न हो सकती है या पृथ्वी के कई टुकड़े हो सकते है !

जीवन और मृत्यु को कौन कमांड कर रहा है!जीवन मृत्यु के सिस्टम को किसने बनाया! इसके पीछे एक बड़ा कारण है एक बड़ा अलौकिक मन है जिसे असीम और न जाने क्या क्या कहा जाता है!

मन एक बहुत बड़ी अलौकिक चीज है,चाहे वो मनुष्य मन हो या असीम का मन, दोनों के ही मन बुद्धि के आधार और प्रत्येक रचना के रचाकार हैं!अन्य जीवों के मन के साथ बुद्धि का समावेश नहीं हैं!इसलिए मनुष्य जीवन को बड़ा भाग्यवान कहा गया है!
दूख की बात ये है की मनुष्य इसे न जानने की कोशिस करता है,और न ही इस पर विश्वास करता है,वो धन के पीछे पागल है,और उसे मनमाफिक धन मिलता नहीं,उसे उतना ही मिलता है जितना उसकी प्रत्येक घटना के लिए जरुरी होता है !अब मनुष्य जबरन अन्य गलत तरीको से धन को पाने की दिशा में चल देता है,और उसके जीवन की घटनाये उसके विस्वास उसके मन के भावो उसके कर्मो के समतुल्य हो जाती है !

ईस्वर का सब कुछ मनुष्य का ही तो है,क्यों कि मनुष्य ही ईस्वर है और ईस्वर का अभिन्न अंग है, ये विरोधाभास इस लिए मनुष्य का अवचेतन मन ही ईश्वरीय चेतना है,चेतन मन से जो कुछ भी अवचेतन में बहेगा वही सम्बंधित जीवन में घटित होगा! आप किसी मार्ग पर एक किलोमीटर जाकर वापस चले आएंगे तो वही पहुचेगे जहा से चले थे!

सभी मन एक मन है ,सभी का जीवन एक है बस फर्क है शारीरिक और मानसिक कर्म का!दुःख को चेतन मन बाहरी भाग से महसूस करता है अवचेतन नहीं,अवचेतन तो उस पर प्रतिक्रिया करता है!
हमें अपने जीवन और इस सृस्टि से सम्बन्धो के बारे में जागरूक होना चाहिए! इससे हमारा ही भला होता है!
अपनी आंख बंद कर लेने से दुनिया में अँधेरा नहीं हो जाता !इस लिए विस्वास जरुरी है,विस्वास यानि आस्था,उसके लिए जो है और नहीं भी है! इसको इस तरह जानिए जैसे हम किसी बटन को स्विच ऑन करते है तो बल्ब जल उठता है या पंखा घूमने लगता है आदि,क्योकि स्विच के पीछे एक ऊर्जा अभौतिक रूप में उपस्थित होती है!जब स्विच को ऑफ करते है तो सारी गतिविधि रुक जाती है!

ठीक इसी तरह जब हम असीम को अपने मन से स्विच कनेक्ट करते है तो वो अनेक गतिविधियों के माध्यम से वो उपस्थित हो जाता है,तथा स्विच डिस्कनेक्ट करते ही उस शक्ति का लोप हो जाता है!और ये शक्ति हम सबके भीतर ही मौजूद है!
इस संसार में सब कुछ अलौकिक है! एक दिन अपने ऑफिस से आप पोस्टमार्टम हाउस जाइये!वहाँ के दृश्य को देखिये,शरीर मरता है और हम उस शरीर की तोड़ फोड़ कर खोजबीन करते है की सायेद एक क्लू मिल जाये की ऐसा कैसे हुआ!
ये जीवन का सफर तिलिस्मी सफर है, इसे सामान्य अवस्था में समझ पाना बहुत कठिन है! योग की गहरी शून्य अवस्था में ही सब कुछ जाना जा सकता है उसके लिए काफी समय तक तपस्या करके मन को उस स्तर पर ले जाना होगा! जहा आप के और ईस्वर के एक साथ दर्शन होते है! यानि आप और ईस्वर दोनों एक ही है !

मनुष्य शरीर और सृस्टि के कण कण में ऊर्जा ही ऊर्जा विद्यमान है! और ऊर्जा एक ही होती है उसके अलग अलग प्रयोग के तरीको के कारण उसकी परिभासा बदल जाती है !
इस सृस्टि को महसूस करे इसे आप अपने ही भीतर पाएंगे
हम जिस ग्रह पर जी रहे है उसके बारे में स्वयं के बारे में नहीं जानेगे तो इसका मतलब ये है की हम एक संकीर्ण भावना में जी रहे है ! और हम परम अज्ञानी है !!

दिन में अनेक कर्मो में सलिप्त होना फिर अँधेरा हो जाना ! रात्रि का समय यानि विश्राम का वक़्त, ये सब कितना लौकिक है! कितनी बढ़िया डिजाइनिंग है लाइफ की, क्या इसको आपने कभी देखा! अनेक रंगो से सजे फूल,तालाब नदिया झरने, पर्वत जंगल लाखो जीव जंतु सब अलौकिक शक्ति की एक छाया मात्र है!

6 thoughts on “अलौकिक सृस्टि ! (Devine,a Nature)”

  1. बहुत सुंदर अजय जी पढ़ कर अच्छा लगा ।अन्तः की खोज अर्थात आत्मा के विज्ञान को जानना या समझना इसी को अध्यात्म कहते हैं ।

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