मैं अजनबी ! एक कविता !

मैं अजनबी
कहा मेरी मंजिल कहा मेरा ठिकाना
कहाँ है मुझे जाना ये किसी ने ना जाना !!

रेत के समंदर में रहता हूँ
लहरों के बीच मेरा घर
धूप की किवाड़ के पीछे
मेरा आंगन
जहा से मेरा आना जाना
कहाँ है मुझे जाना ये किसी ने न जाना !!

एक एक परत लिपटी है मुझसे
यादो के पन्ने में सिमटा शब्दो के भीतर
कई सदियों से
समय की किताब में
मेरा उगना मेरा मिट जाना
कहा है मुझे जाना ये किसी ने न जाना !!

दूर कही से आया हूँ
परिंदा हूँ साया हूँ
अजनबी हूँ, इस घनी बस्ती में
आज हूँ कल नहीं हूँ
फिर वक्त के अँधेरे में मेरा खो जाना
कहा है मुझे जाना ये किसी ने ना जाना !!

जलते बुझते किसी दीए की तरह
मैं ही अंधेरा हूँ मैं ही उजाला हूँ
मैं कोई गीत हूँ
या नशे का प्याला हूँ
मुझे कभी आया नहीं
रोना, रुलाना
कहा मेरी मन्जिल कहा मेरा ठिकाना
कहा है मुझे जाना ये किसी ने जाना !!

मेरे भीतर बहुत कुछ छुपा है
न जाने क्या लिखा है
बहते समय ने
शेष नहीं कुछ भी अब मुझे पाना
कहाँ हैं मुझे जाना ये किसी ने ना जाना!!

बवंडर है कितने
मेरे क़दमों के नीचे
मैं चल रहा हूँ
अपनी परछाईं के पीछे
मेरा कर्म मेरा साया
जो मुझे यहां लेके आया
मुझे नही आता कभी छुपना छुपाना
कहाँ हैं मुझे जाना ये किसी ने ना जाना!!

सपनों की एक गली है
ये जिंदगी
मैं करता नही दोस्ती
मैं करता हूँ बंदगी
इस घूमती धरा पर
एक दिन का आना
फिर चले जाना
कहाँ है मुझे जाना ये किसी न जाना!!

फूल फूल चहके
वो हर चीज महके
सब दशम दिशाए
जहां तक भी जिंदगी हो
हर भेद को मिटाकर
है बस मुस्कराना
कहाँ है मुझे जाना ये किसी ने जाना!!

ये वक्त के सितारे
जो है दामन में अपने
बहुत काफी है
दुआ बन्दगी को
स्वार्थी नहीं हूँ
ऐसा ही हूँ मैं
इक शून्य के भीतर हूँ
काम मेरा है बस स्वयं को जगाना
कहाँ है मुझे जाना ये किसी ने ना जाना!!

मैं अजनबी
कहाँ मेरी मंजिल कहाँ मेरा ठिकाना
कहाँ हैं मुझे जाना ये किसी ने ना जाना!!

3 thoughts on “मैं अजनबी ! एक कविता !”

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