ना जाने क्यों ? एक कविता!

जीवन की बगिया
इस धरा पर महकती
और चहकती हुई
कोयल की कूक की तरह सुरीली
और अलबेली लगती है न जाने क्यों!!

पल पल बहती हुयी
पुरवा और पछुआ
मीठी बयार की तरह
सुबह सुबह सूरज की
पहली रेशमी किरण की तरह
लगती है ये ना जाने क्यों!!

जब से इसको पाए है
इक ताजगी में नहाये है
फूलो की तरह
सावन के झूलो की तरह
ये लगती है ना जाने क्यों!!

कितनी हसी ठिठोली में
रंगी रंग बिरंगी
तितली के जैसी खट्टी मीठी
इमली की तरह
सतरंगी लगती है ये ना जाने क्यों !!

कितने वरस की ये
मेरी साथी जैसे
दीया और बाती हम दोनों
गुन गुन सुर धुन में
एक साथ नृत्य
दृश्य लगती है ना जाने क्यों !!

सुख दुख के सब रंग
संग लिए
मन के भीतर जीती है
ह्रदय कपाट में छुपी हुयी है
पलकों के पीछे नाच रही
ये ना जाने क्यों!!

दूर दूर तक बड़ी सुहानी
जैसे कोई नीली
झील का पानी
कदमो से दर कदम मिलाकार
चलती है ना जाने क्यों !!

कितने दिन और रात
जैसे हो ये कोई सौगात
मानव और सब जीव
जगत की बरसात
चहुँ ओर दिखाई देती है
ये ना जाने क्यों !!

हर्षित तन पुलकित मन
कहाँ से ये लेकर आई
इसका लेख ना जाने कोई
इसको समझ न पाए कोई
फिर भी सभी को प्यारी
लगती है
ये क्यों ? ना जाने क्यों !!

शहद सी मीठी नीम सी तीखी
मिला जुला है
इसका रूप निराला
समय की चादर ओढ़ के आई
कही से सब कुछ छोड़ के आई
इक इक लम्हा जोड़ के आई
जाने क्यों न जाने क्यों !!

सप्त सुरो में भीगी भीगी
समय के रथ से भागी भागी
जैसे गहरी निद्रा से जागी जागी
आगे आगे चलती है
इतनी चंचल मन है
जाने क्यों ना जाने क्यों !!

ये जीवन ही है या कुछ और
बड़ी सुहानी बड़ी सयानी
प्यारी प्यारी सी लगती है
पावन पावन मनभावन
झूम उठा है अंतः आँगन
मैं हूँ अब इक नील गगन
आज अभी ना जाने क्यों !!

जीवन की बगिया
इस धरा पर महकती और
चहकती हुई
कोयल की कूक की तरह सुरीली
और अलबेली लगती है न जाने क्यों!!

बंधन जीवन से जीवन का
चलता रहेगा यू ही जीवन भर
दुआ है मेरी उस जीवन से
जिसने इसे दिया है सबको
धन्यवाद है उस रब को
धन्यवाद सबको
ह्रदय से ये पुकार उठती है
धन्यवाद की धारा बहती रहती है
जाने क्यों ना जाने क्यों !!

I

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