तथास्तु! (ब्रम्हाण्डीय चेतना और मनुष्य चेतना ) Must read!

तथास्तु!सब जगह उपलब्ध है,मनुष्य जिस चीज पर विस्वास करता है,उसके हर विस्वास पर एक तथास्तु लग जाता है,तथास्तु एक प्रकार की God Blesing है जो सृस्टि में अनवरत बह रही है! शून्य ब्रम्हाण्ड की चेतना है इस ब्रम्हांडीय चेतना में असीमित अलौकिक ज्ञान विज्ञान सब हिलोरे ले रहा है! मौन ब्रम्हांडीय चेतना की भाषा है! मनुष्य का अवचेतन मन ईस्वरीय गुणों से परिपूर्ण है! शून्य और शक्ति दोनों ही गुणातीत है!ये बस एक चेतना है और दोनों एक दूसरे में समाहित हैं!

इसे ऐसे भी समझे की हर तरफ बहती हुई चेतना मनुष्य मन के विश्वास को पकड़ती है! और उस विस्वास के गुण धर्म के अनुसार प्रतिक्रिया करती है, ये बहुत आसानी से होता रहता है और मनुष्य को पता ही नहीं चलता !यदि विस्वास नकारात्मक है तो परिणाम भी वैसे ही घटित होता है! विस्वास अवचेतन मन की एक शक्ति है,तथा अवचेतन मन हर पल ब्रम्हांडीय चेतना से एक रूप होता है,

मनुष्य और विभिन्न जीवो की भी चेतना असीम शून्य से एकरुप है ये शून्य और शक्ति जो स्वयं एक गुणहीन अवचेतन हैं के द्वारा रचित है! सभी जीव जंतु और मनुष्य का अवचेतन मन शून्य और शक्ति के अवचेतन से एक रूप है! किन्तु शक्ति द्वारा रचित संसारी माया, जाल के नियम भी गुणहीन और अवचेतन है! शून्य और शक्ति की चेतना तीन शब्दो को उत्पन्न करती है जो, अ ऊ म है! इन तीन शब्दो की ध्वनि अनाहत रूप से सृस्टि के एक एक कण में व्याप्त है!

उपरोक्त तीन शब्द से सभी भाषाओँ का जन्म हुआ,तथा इसे पवित्र मंत्र,और ब्रम्हांडीय जीवन स्रोत्त के रूप में माना गया है ! शून्य और शक्ति(एनर्जी)को मनुस्यो ने अलग अलग नाम दिया! और अपनी अपनी दृस्टि कोण से उसकी पूजा अर्चना करता है मनुष्य के हर विश्वास पर एक तथास्तु चस्पा है किसी प्रकार की विधि विधान की जरुरत तब होती है,जब मनुष्य अवचेतन बहुत ही नकारात्मक भावो से भरा हो !

तब ध्यान Maditition योग क्रिया से अवचेतन मन के समस्त विकारों को दूर किया जाता है! जैसे किसी फसल को उगाने से पूर्व खेत के खर पतवारों को नस्ट करना होता है! तथास्तु को एक उचारक शक्ति कह सकते है जो शून्य और शक्ति के अवचेतन की ही एक क्रिया है!

जब किसी मनुष्य को सारी सृस्टि ही अपनी लगने लगे,उसके हृदय में सृस्टि के सभी जीवो और सभी मनुस्यो से एक समान प्रेम की अमिट धारा बहने लगे,उसका मन सभी प्रकार के अंतर्द्वंद से ऊपर उठ जाये तो वही मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर एक सच्चा कर्मयोगी मनुष्य है! मनुष्य की मानसिक अवस्था भी एक कर्म की स्थिति होती है! तथा मन के सभी भाव और विचार कर्म बीज होते है!

अवचेतन मन भावनाओ तथा आस्था का केंद्र है,यह भी शून्य है जो दिखाई नहीं देता सिर्फ महसूस होता है!और ये शून्य तथा सृस्टिसे एक रूप है! कर्म लोक में जीवो का आगमन सृस्टि और जीवन प्रवाह का अनुभव तथा अवलोकन हेतु होता है!किन्तु सृस्टि के माया जाल में वो उलझकर स्वयं को तथा अपने उद्देश्य को भूल जाता है!वो स्वतंत्र होने के कारण किसी भी चरित्र या रोल को अपना लेता है! तथा संसार कर्म पटल पर अपने कर्म को स्थापित कर वापस चला जाता है!

इसी को सृस्टि का खेल कहा गया है चुकी सृस्टि कर्ता स्वयं ही इस खेल का इक हिस्सा है! इसलिए बाहरी जगत में सबकुछ कठिन लगता है और तब तक जब तक उस मनुष्य का अपना जीवन होता है तत्पश्चात उसके लिए सब कुछ सामान्य होता है! इसे ध्यान की गहरी शून्य अवस्था में जाकर देखा जा सकता है!

ध्यान में मनुष्य अपने भीतर स्थित शून्य अवचेतन में प्रवेश करता है जहाँ पहुँच कर उसे सत्यता का ज्ञान होता है !
की वो और असीम ब्रम्हांडीय चेतना दोनों एक ही है,इस लिए उसके हर विस्वास पर तथास्तु की एक अलौकिक क्रिया घटित होती है जो संसार के परदे पर घटना के रूप में परिलछित होती है!!

बाहरी समस्त ज्ञान नश्वर होते है इनका उपयोग जीवन यापन हेतु तभी तक है जब तक मनुष्य जीवन है! सास्वत ज्ञान मन के भीतर शून्य अवस्था में स्थित होता है! इस ज्ञान को पाकर मन की तीव्र गति को शांति मिल जाती हैं! और किसी विशेस वस्तु की कामना नस्ट हो जाती है! मन को असीम सुख और शांति की प्राप्ति हो जाती है!यदि साधक इस अवस्था में बार बार कोई कामना करे तो बहुत शीघ्र वो कामना किसी न किसी रूप में साकार हो उठती है ! इसलिए बहुत से योगी पहाड़ो और गुफाओ में अपना जीवन सम्यक रूप से बिताते है !मनुष्य रूप में भी उनकी चेतना ब्रम्हांडीय चेतना में हर पल विलीन ही रहती है !

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