आदतें और जीवन !(Habbites in life)

हमारा जीवन आदतों का जीवन है!आदते ही जीवन का निर्माण करती है!किसी भी आदत को जड़ पकड़ने में लगभग
एक माह या इक्कीस दिन का समय लगता है!इसका एक जबरदस्त मनोबैज्ञानिक कारण है!मनुष्य मन के दो भाग है!
0 consias mind (चेतन मन)
0 subconsias mind (अवचेतन मन)
Left bren(बायां भाग)
Righte bren (दाहिना भाग)

बायां भाग लॉजिक माइंड है,दाहिना भाग क्रिएटिव माइंड कहलाता है! ये दोनों माइंड अपना अपना काम बखूबी निभाते है !
जब मनुष्य कोई भी कार्य बतौर शौकिया करता रहता है तो धीरे धीरे उसे उसकी लत पड़ जाती है!शौकिया तौर पर वह कार्य चेतन मन द्वारा किया जाता है! लेकिन उस कार्य की प्रकृति अवचेतन मन में स्टोर होने लगती है ! अब एक नए दिमाग का जन्म होता है!आदतों का दिमाग!

मनुष्य जो देखता है सुनता है ! तथा जो कार्य करता है वो सब प्रत्येक छड़ उसके सबकॉसियस माइंड में जमा होता रहता है !ये मनुष्य के कर्मो का चित्रगुप्त है जो सारा हिसाब किताब बहुत जतन से सॅभाल के रखता है !इसे यादें भी कहा जाता है! जब मनुष्य अकेला या एकांत में होता है तो ये अवचेतन मन अपने भीतर स्टोर सभी चीजों को रिफ्लेक्स करता है ! और मनुष्य गहरी यादो में कुछ देर के लिए कही खो सा जाता है!

हमारा सोंचना,देखना चलना फिरना कार्य आदि सब कुछ चेतन मन द्वारा होता है! किंतु मन के एक गहरे कोने में ये सब जमा होता रहता है इसे ही अवचेतन मन कहते है !अवेतन मन को प्राण भी कहते है!यानि (Sol) सोल,आत्मा और यह बहुत ही शक्तिसाली ऊर्जा है! जीवन और मृत्यु से परे की बस्तु है ये! हमेसा शरीर ही मरता है आत्मा नहीं! स्टोर की गयी सारी चीजे ही संस्कार कहलाती है !

आदते जब अवचेतन मन में स्टोर हो जाती है ,तो मनुष्य को अच्छे सँस्कार या बुरे संस्कारो वाला व्यक्ति कहा जाता है!बात करते है लॉजिक और क्रिएटिव माइंड की! ब्रेन का बाया भाग हर चीज को बहुत काट/छांट करके उसमे लॉजिक वाली चीजे ढूढ़ता है ! जबकि क्रिएिव माइंड चीजों को क्रिएट करने का काम करता है !

हर प्रकार के सुनहरे ख्वाब यही सजाता रहता है! ये उ्मीद को सृजत करता है! तथा नए नए आइडियाज उत्पन्न करता है ! और भरोसा देता￰ है की यही सही है ! मनुष्य की मृत्यु के पश्चात जीवन भर के संस्कार यादें एक प्रबल भावना का रूप धारण कर आत्मा में समाहित हो जाती है ! तत्पश्चात आत्मा को अपने भीतर समाहित भावना के अनुरूप एक नए शरीर में दोबारा जन्म लेना पड़ता है , अपने भीतर समाहित बुरे संस्कारो को मिटाने के लिए !

भावना या भाव तीन प्रकार के होते है !
0 पशु भाव
0 मनुष्य भाव
0 देव भाव
पशु भाव से ग्रसित मनुष्य पशुओं की तरह जीवन जीता है जैसे,क्रोध ,अहंकार जलन किसी को सम्मान न देना ! चोरी बेईमानी चल कपट आदि कर्मो में लिप्त रहता है !

मनुष्य भाव वाला व्यक्ति सबको एक सामान समझता है ! सबको आदर प्रदान करता है ! और मेहनत ,ईमानदारी का जीवन जीता है !
देवभाव वाला व्यक्ति परम संतोसी एवं जीवन के हर पहलु में आनंदित रहने वाला होता है ! वो सबकी भलाई के काम करता है और हमेसा असहायों की मदद करने में आगे रहता है !

आदते ही भावो को जन्म देती है ! आदते जब तक चेतन स्तर पर होती है तो आसानी से उन्हें बदला या मिटाया जा सकता है ! लेकिन अवचेतन स्तर पर हो जाने के बाद आदते जल्दी नहीं बदलती , इसके लिए लोग ड्रग्स लेते है ! संकल्प लेते है, लेकिन कुछ समय बाद आदते मनुष्य पर फिर हावी हो जाती है !बुरे आदतों और संस्कारो को मिटाने का एक ही माध्यम है ! ध्यान योग ! ध्यान आदतों को अवचेतन मन से जड़ से मिटा देता है ! तथा वहाँ देव भाव को प्रतिस्थापित कर देता है !जिससे मनुष्य का जीवन फिर से खिल उठता है !

ध्यान के समय आदिशक्ति (ऊर्जा) जब ऊपर सहस्त्रार की तरफ जाने लगती है तो सुसुम्ना नाड़ी के भीतर व्याप्त
अवचेतन के सभी बुरे संस्कारो को भस्म करती चली जाती है ! साधक का अवचेतन मन पवन और पवित्र हो जाता है ! जिससे उसके जीवन के सारे कस्ट दूर हो जाते है !

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