सबसे बड़ा देवालय !(most,big devine place)

भारत भूमि के महान सिद्ध योगी जनो ने, तीन तरह के देवालय के बारे में बताया है!
0 अधम देवालय
0 मध्यम देवालय
0 सर्वोंत्तम देवालय
अधम देवालय उन्हें बताया है जो सड़को के किनारे जबरन बनाये गए ! माध्यम देवालय वो जिनका निर्माण सर्वजन की सहमति से उचित स्थानों पर हुआ है! इन दो प्रकार के देवालयों को मनुस्यो ने बनाया , लेकिन जो तीसरा सर्वोत्तम देवालय है उसे स्वयं शून्य (शिव)ने बनाया है !

मनुष्य शरीर ही सर्वोत्तम देवालय है!मनुष्य शरीर पांच महाभूत तत्वों का एक अद्भुत संरचना है!मनु्य शरीर में सर्वोच्च शक्तिया विद्यमान होती है! जिसमें सात चक्र और कुण्डलनी प्रमुख रूप से होते है !
0 मूलाधार चक्र (kudalni)
0 स्वाधिष्ठान चक्र
0 मणिपुर चक्र
0 अनाहत चक्र
0 विशुद्धि च्र
0 आज्ञा चक्र
0 सहरार चक्र

ये सभी चक्र हमारे प्राण शरीर में उपस्थित होते है !इसलिए ये सिर्फ योग की अवस्था में ही दिखाई देते है!
प्रमुख कोष
0 अन्नमय कोष
0 ज्ञानमय कोष
0 प्राणमय कोष
0. आनंदमय कोष
जब कोई मनुष्य ध्यान में बैठता है तो उसके भीतर की समस्त ऊर्जा एक स्थान पर एकत्रित होने लगती है !मूलाधार रीढ़ के निचले भाग में जहा आदि शक्ति कुण्डलनी आकार में सुप्त अवस्था में हमेसा विद्यमान रहती है तथा सिर के ऊपरी भाग सहस्रार में जिसे बैकुंठ धाम ब्रम्हलोक कहा जाता है यहाँ शिव का स्थान है ! ध्यान की गहरी अवथा में कुण्डलनी ऊपर की और उठती है जो स्वयं आदिशक्ति है

आदिशक्ति ब्रम्हलोक में स्थित शिव से मिलन हेतु ऊपर सहस्रार की तरफ बढ़ती है ! इन दोनों के मिलन के समय साधक के खोपड़ी के भीतर स्थित पिटयुटरी ग्लैंड से एक प्रकार का अमृत टपकता है ! जो सर्वरोगनासक होता है, तथा साधक के सभी कामनाओ की पूर्ति करता है !

जब आदि शक्ति ऊपर की और उठती है तो साधक को पता चल जाता है की वो ईस्वरीय अनुकम्पा को प्राप्त होने वाला है !उस समय साधक को अपने भीतर असीम दैवीय शक्ति का अनुभव होता है ! मनुष्य शरीर के भीतर इड़ा पिंगला सुषुम्ना ये तीन त्रिवेणी नदिया होती है जब आदि शक्ति सास्त्रार में प्रवेश करती है तो महासंगम का संयोग स्वमेव बन जाता है ! शिव और शक्ति दोनों एक दूसरे के आधा अंग होते है ! ध्यान की गहरी तुर्या अवस्था को किसी भी पवित्र स्नान से ज्यादा पवित्र करने वाला माना गया है !

मनुष्य स्वयं शिव है , और वो इस पृथ्वी पर जीवन के अनुभव त्तथा अवलोकन हेतु कार्मिक यात्रा पर आता है !सिद्धो ने सभी मनुस्यो को शिवोहम कहा है , यानि सभी शिव है ! ये एक विचित्र समझ से परे लगने वाली बात है ! किन्तु यही सत्य है ! मनुष्य शारीर में इस शिवत्व को महसूस तो किया जा सकता है ! किन्तु इसे बाहर प्रकट नहीं किया जा सकता ! शिव स्वयं विभिन्न मनुष्य रूप धारण किये हुए है ! तथा ये अपने कर्मो का परिणाम भी स्वयं ही भोगता है ! ये कैसी विचित्र विडंबना है !

मनुष्य शरीर परम शक्तियो पूर्ण भंडार है ! इसलिए मनुष्य ही अपने,भाग्य का रचयिता है !मनुष्य शरीर को सर्वोत्तम देवालय इसी लिए कहा गया है !

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