(MUST READ) मन और सृस्टि !

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Hi,
कैसे हो आप सब ? आप सभी का धन्यवाद ! कुछ जरुरी काम की वजह से इस पोस्ट को पूरा नहीं कर पाया था,अब इसे कम्पलीट कर दे रहा हूँ! मैं इस तरह का कोई भी पोस्ट तभी लिखता हूँ!,जब अंतर्मन से प्रेरणा आती है,और मेरे हरेक पोस्ट में जो बातें है सब सच है ,स्वयं मेरा अनुभव है !

मन और सृस्टि क्या हैं,सभी लोग इसे अलग अलग चीज समझते है ! ये दो अलग अलग रूपों में समझ में आती हैं, किन्तु ये अलग तत्व नहीं है , दोनों एक ही तत्व है ! यदि आप ध्यान की गहराई में जाकर देखो तो, सृस्टि और आप एक हो ये आप स्पस्ट जान जाओगे , सृस्टि भी एक असीम उर्जात्मक मन है ! और आपका मन भी ऊर्जा का एक केंद्र बिंदु है , आपका मन सृस्टि का एक दूसरा रूप है , जो हर सेकेण्ड बहरी सृस्टि के तारतम्य से जुड़ा है !

आपका मन बाहरी सृस्टि का ही एक भाग है !
मान लीजिये बाहरी सृस्टि/बाहरी दुनिया एक दर्पण है
mirror, सीसा है !, यह आपके जीवन में उसी ,चीज को दिखाता है जैसा भी आपके मन में चल रहा होता है , अगर आपकी नाक बंद हो तो किसी भी प्रकार के इत्र का आपके लिए कोई मायने नहीं है , यदि आँख से कोई अँधा व्यक्ति हो तो खूबसूरत चीजों का भी उसके लिए कोई महत्त्व नहीं होता ! ,मनुष्य मन स्वयं एक सृस्टि का निर्माण करता है,जैसे कोई अविष्कार , परिवार ,टेक्नोलॉजी,इंटरनेट,परमाणु जहाज , भोजन दवाइयाँ आदि !

जैसे मोबाइल की तरंगे हमें दिखाई नं देती , टेलीविज़न के वेब डेल्टा तरंगे भी नहीं दिखाई देती , किन्तु वो तरंगे डेल्टा वेब हमारे रूम में हमारे किचन में हमारे ऑफिस में हमारे वातावरण में सब जगह फैले हुए है तभी हमारे सारे डिवाइस काम कर रहे है वर्ना सारे उपकरण डेड पड़े रहते

ठीक इसी तरह बाहरी सृस्टि की तरंगे हमारे मन की तरंगो के साथ लयवद्ध होती है,जब हम पूर्ण मन से किसी एक चीज पर लगातार कुछ समय तक विश्वास बनाये रखते है या सृस्टि के साथ मानसिक घर्सण की अवस्था में रहते है तो बाहरी सृस्टि में मौजूद एलिमेंट्स आपके विस्वास को साकार रूप में परिवर्तित कर देते है और आपको अपना इनाम मिल जाता है अब यह चाहे किसी से अनजाने में हुआ हो या जानबूझकर हो !

इंसान की मृत्यु के उपरांत , मृत शरीर के सभी पांच तत्व अपनी अपनी जगह वापस लौट जाते है, मानसिक सृस्टि और सांसारिक सृस्टि दोनों एक है ! मृत्यु से पहले तक दोनों हमेसा मिलकर एक साथ काम करते है ,और बाद में भी एक वो एक दूसरे में विलीन ही रहते है !

सृस्टि हमेसा शून्य अवस्था में होती है यदि ये बात समझ आये की सृस्टि मनुस्यो , और जीव जन्तुओ के माध्यम से ही हर पल स्वयं को महसूस करती है ! ईस्वर का अपना कोई आकार नहीं है , किन्तु उसने साकार सृस्टि की रचना की है !समस्त सृस्टि ही उसका अपना साकार रूप है !

मनुष्य और सभी जीव जंतु ईस्वर सामान है ! फर्क सिर्फ ये है की वो साकार रूप में सीमित ऊर्जा को धारण करके अपने अपने किसी कार्मिक , कर्म यात्रा पर है !!

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