ध्यान-5 maditition(काया kalp)

अब आप योग के मार्ग पर आ चुके हो ! योग का अर्थ है उस अस्तित्व से स्वयं को सीधे जोड़ना जो आप चाहते हो .ध्यानका अर्थ है की सिर्फ उसी अस्तित्व को साकार रूप में प्रकट कर लेना जो आप चाहते हो ! इसके अलावा और कुछ भी नहीं ! ये कैसे होता है जब परमात्मा.ने इस सृष्टि की रचना की तो योग की अवस्था में रचना की , उसने जो विचार किया वो विचार साकार रूप में प्रकट हो गया ! उसके ध्यान में सिर्फ सृष्टि रचना थी सो सृष्टि प्रकट हो गयी ! किन्तु इसके लिए भी समय लगा था एक, एक चीज व्यवस्थित हुई !सृष्टि रचना तो हो गयी ना ! वो असीम शक्ति सबके भीतर व्याप्त है किन्तु साकार पृथ्वी पर अनेक आवरण में दबी है ! उसे जागृत कर लेना ही ध्यान है योग है ! और इसका बस यही एक रास्ता है !जब आप ध्यान की गहरी अवस्था में जाने लगेगे तो सारी बाते आप स्वयं जान जायेगे ! ध्यान हर दिन करना है ! कुछ महीनो में ही आप एक ऐसी अवस्था में जाने लगेंगे जिसे तुर्या अवस्था कहते है ! इसी अवस्था में जाकर आप ज्ञान की प्राप्ति करते हो ! और आप जो चाहो उसे क्रिएट कर सकते हो ! आप जो चाहो पा सकते हो ! अभी आप मनुस्य योनि में है कुछ चीजे आपके लिए आपके सपनो सामान मिलती जुलती प्रकट होगी ! और आपके जीवन को सुखद बनाएगी !तुर्या अवस्था एक विहंगम ब्रम्हांडीय शून्य अवस्था है ! आप शरीर से परे हो जाते हो अलौकिक हो जाते हो बस कुछ देर के लिए ! ये ईस्वरीय अवस्था है इस वक़्त आप एक साधारण इंसान नहीं होते ! आप स्वयं असीम हो जाते हो क्योकि सर्वशक्तिमान आपके भीतर है और आप ही सर्वशक्तिमान हो ! यही सच है आप क्या हो आप स्वयं को देख लेते हो !ध्यान से हटते ही आप पुनः एक आम इंसान के रूप में आ जाते है ! क्योकि आप अपनी सृष्टि को महसूस करने के लिए ही इस मनुस्य जीवन में आये हैं!इस जीवन में भी आप है पार लौकिक जीवन में भी आप ही है !…
अगले भाग में ..thanks

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