सुहाने पल

बादल बारिश से भरे उड़ते हुए छतरी बन आसमान में मडराने लगे तितलियाँ भी गीत गाने लगी अरहर की फलियों पर पानी की बुँदे गिरती हुयी कुछ ठंडक भरी हवाएं वेगवान चेतना नयी समेटे हुए टूटे कितने ही पेड़ फूल पत्ते भीगे दरख्त कंटीले बाँसो के झुरमुट मोर यहाँ पंख पसार नया गीत कोई गाने लगे ! मेघ चिलाने लगे शहर की सड़को पर काले सफ़ेद छाते एक दूसरे से टकराने लगे ! जंगल नदी तालाब क्या हर तरफ हरियाली छा गयी कैसा ये कुदरत का रूप है दिन हो रात है अमृत की वरसात कही किसी घर में टूटी हुयी छत से पानी की बुँदे बर्तनो पर टपकती हुयी इस पल ये बड़ा अच्छा लगता है ! गिरते हुए दरख्त आँधियो से मात खाकर धंस जाती है सड़के अनेक दृस्य पनपते है जमीन के दल दल में ! बहुत दूर समुन्द्र के सीने पर शार्के दौड़ती है और कूदती है बरसते हुए जल के साथ साथ जल प्लावन लेकिन मनभावन ! झीलो में मेढक चिल्लाते है नदी के किनारे आकर मगरमच्छ झूठे आँसू बहाते है कुछ दुखद घटनाओ को छोड़ कर बहुत ही पावन है, क्यों की ये सावन है !

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