मनुस्यता

इक नींद प्यारी सी अपने परो के सहारे तैरती रहती है मन में! कुछ अपनी मुट्ठी में लिए जो खुशी से भरी है चित्त में उतर आती है कभी कभी कुछ पल के लिए ! विशाल मन की सीढ़ियों पर दौड़ लगाती है ! उलझ जाती है मेरी उलझनों के साथ !इक दावा तैयार करके की मेरे हर समय में वो मेरे साथ है ! मैं पहुँच जाता हु वहाँ जहा सफ़ेद बादलो की गुफाये बनती बिगड़ती रहती है ! उस दरख़्त के पास जो रेगिस्तान में मौजूद है बिना अपनी टहनियों के ! इंसानो के निशान भी नहीं मिलते किन्तु उनके चलने की आवाजे आती है बहुत दूर नीले समुन्द्र के बीच इक छोटी सी नाव के निकट जो वक़्त के थपेड़े में अकेली लहरों के बीच किसी मल्हार के बिना बेकार पतवार के साथ खुद को बचाने की कोशिश करते हुए चुपचाप इक किनारे की तलाश में चली जा रही है !
कोई साउन्ड सिस्टम नहीं जो दूर बैठे लोगो के कानो में उसकी चीख पुकार सुनाई दे !ऐसे दृस्य भयावह सवेदना से भरे हुए मिटटी के नीचे रासायनिक वास्पो के बीच जल के उस तल तक जो सैवालो से भरी हुयी है वहां भी ले जाती है मुस्कराना पड़ता है बेबस अनायास इस नींद के संजाल से ! इक नींद प्यारी सी तैरती रहती है मन में !!

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