सच्चाई

आँखे सब देखती है जागती है पलकों के पीछे नींद में भी कोई संसार तलाशती रहती है ! पहचानने की कोसिस करती है जो हमें बताया नहीं गया था बाहरी उपक्रम को बनते बिगड़ते देखकर वो पल सारे अनमोल है ! आँखों का कैसा रहस्य है, जो सब तरह के दृस्यों को छुपा लेती है खुद के भीतर ! आँखे है तो सूर्य है,उसका उजाला है नहीं तो दिन चढ़े भी अँधेरी रात है,काजल की बंद कोठरी समान अत्यंत काला ही काला है !

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s