भटकाव

बंद लकीरे मिटती है बनती है इक प्रश्न के साथ इक प्रश्न को त्याग कर ! रेखाओ का महत्त्व इतना है की सरहदों पर गोलियाँ चलती हैं! इक नासूर जो हर चीज में बावस्त है बहुत कुछ सड़ता रहता है बाहर आने के लिए ! मन तैयार नहीं हो पाता कुछ अलग समझ पाने के लिए ! इनसान किस काम का वक़्त चीखता है जब कही मिट्टी लाल होती है ! इतिहास के काले पन्ने थोड़े और बढ़ जाते है ! ये बदलाव कुछ बताता है राह से भटके हुए इंसानो को ! क्या रेखाओ का खेल जारी रहेगा अपनी सरहदों से निकलकर जब तक हममें से कोई एक भटकता रहेगा इसके लिए किसी और को तैयार करता रहेगा l

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