अहसास

शीशे टूट कर रोते है अक्सर, अक्स के कभी पाँव ही नहीं थे ! वरना बहुत कुछ बता सकते थे बिना कुछ कहे ! इंसान हर पल गलरहा है अपने ही भीतर ! सीसे की तरह टूट जाता है कभी! वही फकर है जो बस खोपड़ी में भरा है ! चक्र समय का ले आता है फिर वही आदमी चेहरे बदल कर नंगी जमीन पर चलने के लिए ! रोना किस बात का नियति तो उग आती है घास की तरह ! अब तो दरख्तों में लगे घोसले भी ढूढ़ते है अपने पछियों को ! छोड़ना पड़ता है बहुत कुछ समय के साथ! मै अगर जीवित हु तो यह भी सिर्फ कुछ समय का इक ख्वाब ,ही तो है !!

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