लहरे !

मन की लहरे चली आती है पलकों के बाँध तक छलक पड़ती है इस उम्मीद से की इंसान अभी जिन्दा है !

मुर्दो को कुछ फरक नहीं भावनाओ की रेत्त जब उड़ती है न जाने कितनी आँधियो में गालो की जमीन गीली हो जाती है कैसा विश्ववास बचाये रखता है उसको परछाई भी जब कभी कभी साथ छोड़ने लगती है ! मुस्कराना हक़ है उसका फिर कोई छीन लेता है उसस्के चेहरे पर उपजी टेढ़ी मेढ़ी रेखाएं सकूँ की इक नींद भी नहीं मिलती उजाले तक आँखों में नमी रहती है !

जाने कितने काटे है पैरो में चुभ जाने के लिए कभी बखुद या गिरा दिए जाते है अहसास के समुन्द्र में डूबने लगते है विचार समय के बवंडर में कुछ सेष नासूर की तरह पकता हैअपनी जड़ो को पोषित करके आहिस्ता आहिस्ता इसे जानते है सब लेकिन समझते नहीं अस्पस्ट यहाँ तो आँधिया चलती है सभी के लिए

कुछ चीजे जो हर घडी साथ होती है वो उन्हें नोचकर खुद से अलग कर नहीं सकता जीना पड़ता है हरेक दसा में जीने के लिए अब तक जी चुके जीवन के साथ ! फिर पुनः कोई जीवन अंकुरित होता है अपनी भूमिका के साथ कुछ ऐसे ही बुँदे उड़ती है विचार जलते है धुएं की तरह गालो की जमीन गीली होती रहेगी ! किसी झूठी उम्मीद से चलता रहेगा खुद को बदलता रहेगा ! मन की लहरे आती रहेगी क्रमसः नहलाती रहेगी !!

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