एक विचार !

शून्य के साये में मंगल की पथरीली जमीन पर हवाएं अपने अकेलेपन के साथ घूमती हुई जाने क्या ढूढ़ती है इधर उधर टहलती हुई जाने कहा से इनकी गति है ! उड़ते हुए तारे देखते है पृथ्वी को जैसे वहां पर कोई है तथा मुझे भी वो देखता रहता है वहां से !! लटकती हुई… Continue reading एक विचार !

स्वार्थ ! अधूरा सच !

धुएं की तरह जिंदगी बिखरी पड़ी है हमारे आस पास जैसे वो इक लम्बे समय से जलती आ रही हो ! सड़को के गड्ढे गालो पर उतर आये टूटे फूटे खँडहर जैसा मन इसमें तृस्ना के कीड़े कुलबुलाते है ! हम है मकड़ियों के जैसे जिसमे ख्वाबो के घर बनाते है चीखते है विचार एक… Continue reading स्वार्थ ! अधूरा सच !

धन !

कितने भार लिए वो घर से निकलता है धन के लिए हर शाम को पीता है बेचैन मन के लिये डर है कुछ भीतर जाने कैसा कुछ अजीब सा उसके माथे की सलवटे बताती है पुराना घर न जाने कब गिरने वाला है काश वो ये जान पाता, या इतना कमा पाता कोठरियाँ तोड़कर फिर… Continue reading धन !

लहरे !

मन की लहरे चली आती है पलकों के बाँध तक छलक पड़ती है इस उम्मीद से की इंसान अभी जिन्दा है ! मुर्दो को कुछ फरक नहीं भावनाओ की रेत्त जब उड़ती है न जाने कितनी आँधियो में गालो की जमीन गीली हो जाती है कैसा विश्ववास बचाये रखता है उसको परछाई भी जब कभी… Continue reading लहरे !

आभार !

उस अँधेरे उजाले का जिसने मुझे ये प्रेरणा दी उन सभी जीव जन्तुओ मनुस्यो ग्रहो का तथा वस्तुओ का जो मेरे समय में मेरे साथ बने है तथा मै उन्हें देख पाता हु उन कणो जो मेरा भार सहते है उन सभी मित्रो को जो मेरे सभी समय में मेरे साथ है तथा उन सभी… Continue reading आभार !